Monday, 10 August 2020

मुझ में रहती हैं

 उसे लिखने कलम उठाती हूँ और रख देती हूँ

मेज की दराज में अब उसकी तस्वीर भी नहीं रहती है

हालांकि फ़ोन की गैलरी में अब भी खुद से ज़्यादा उसकी तसवीरें हैं

और किसी भी नए ऐप से उसकी और हमारी तस्वीरों को खूबसूरत बनाती रहती हूँ

पर फिर भी जाने क्यों दुनिया का कोई ऐप साथ के उन लम्हों जितनी खूबसूरत तसवीर नहीं बना पाता...


हाँ उसका फ़ोन नहीं आने पर अब बेचैन नहीं होती, 

ना ही बच्चों की तरह, स्क्रीन पर उसका नंबर देख के उछल ही पड़ती हूँ 

लड़ कर झगड़ कर उसे वॉट्सऐप टेलीग्राम या सोशल मीडिया पर ब्लॉक भी नहीं करती फिर भी दिन की शुरुआत उसे गुड मॉर्निंग कहे बिना नहीं कर पाती...


यूँ तो वो कहता है कि मेरे आने या जाने से उसे फ़र्क नहीं पड़ता 

पर जैसे ही लौटती हूँ वो दोनों बाहें खोल कर इंतज़ार करता ही मिलता है...जैसे जानता था लौट आऊंगी...  हाँ मैं भी जानती हूँ कि  लौटना तो तय ही है...


वो रूठ जाए तो उसे मनाने को अब अहम बीच नहीं आता..

जाने क्यों लगता है खुद से रूठ कर भला कहाँ जाउंगी...

सब कह देती हूँ उससे, अच्छा बुरा सब

अब अच्छे बनने की कोई ख्वाहिश उसके आगे कुलांचे नहीं भरती


उसे गले लगाए महीनों गुज़र गए हैं.. हूक सी उठती है कई बार...

बस एक बार गले लगाने को मन आकुल हो उठता है 

और ये सब सिर्फ़ मैं कहती हूँ वो नहीं

ये बात मेरी हूक को तनिक और पैना कर देते हैं...

मैं फिर भी चुप रहती हूँ

वो कहता है हर बात कहनी नहीं होती, 

और मैं फिर सोचती हूँ 

वो कहता है तो ठीक ही कहता होगा 

मैं दिल को उसकी कही हर बात समझा देती हूँ, 

और वो भी समझा देती हूँ जो उसने नहीं कही...

पर क्या मैं खुद को समझ पाती हूँ कुछ भी...


कई बार सोचती हूँ क्या उसे फर्क नहीं पड़ता होगा जैसे मुझे पड़ता है

फिर लगता है इस बात से भी क्या फर्क पड़ता है 

क्यों ही पड़ना चाहिए

हाँ छोड़ो, मैं जानती हूँ बहुत फर्क पड़ता है...


उसे छुए जाने कितनी सदियां बीत गई 

हालांकि जाने क्यों वो अब भी चंद महीनों की ही ताकीद करता है, ...

मैं नहीं जान पाती ठीक ठीक कि कैसे उसे जाता हुआ पलाश और आता हुआ सावन 

बीतते वक़्त का एहसास नहीं कराते...


जेठ की कड़ी  धूप से आने के बाद माँ देती थी कुछ मीठा और ठंडे पानी का गिलास

उस पहली घूंट का आत्मा तक पहुंचना याद है मुझे

हाँ बस उतनी ही तर जाती हूँ मैं उसके होने के एहसास भर से  

वो जो मेरी हर अधूरी कविता का नायक है 

मैं जिसके प्रेम में हूँ

 जो मेरे जीवन आधारशिला का महत्वपूर्ण आवलम्ब है 

वो जिसका होना मात्र ही सुकून है 

वो जो मुझसे कहीं ज़्यादा मुझमें रहता है 

हाँ अब मेज की दराज में उसकी तस्वीर नहीं रहती...


मुझ में रहती  है...

बचपन वाला बुद्धु बक्सा

 छोटी थी तब, तक़रीबन 7-8 साल की, मोगली की ज़बरदस्त फैन थी, वही जंगल बुक वाला, इतनी की उसी के जैसे हरकतें भी थी उछलना कूदना लटकना मटकना सब..फिर एक दिन टीवी खराब हो गया और मेरी बचपन वाली दुनिया जैसे उजड़ ही गई...

पर मैं आपदा में अवसर तब भी ढूंढ लेती थी तो फॉर्मूला ऐसे सेट हुआ कि बगल में एक आंटी रहती  थीं, मुझे खूब प्यार करती थीं प्यार तो मैं भी करती थी पर मेरा प्यार उनके लिए कुछ कम और उनके टीवी के लिए ज़रा ज़्यादा था...तो हर संडे मैं उनके घर पहुंच जाती थी जंगल बुक देखने सिलसिला ठीक ठाक चल रहा था पर कब तक..

क्योंकि घर में थे बाबा यानि दादाजी,उनके साथ इक्वेशन ऐसा था कि एक दूसरे के बिना तब हमारा गुजारा नहीं हो पाता था, तो हर रविवार को मेरा घंटे दो घंटे गायब होना वो ऑब्ज़र्व कर रहे थे, दो तीन संडे तो कुछ नहीं बोला गया पर चौथे सण्डे भी जब मैं घर में न मिली तो लौटते ही कचहरी लगी, मुझे सम्मन हुआ और जब सम्मन हुआ तो पेशी भी हुई सवाल था कि हर रविवार गायब क्यों हो जाती हो, दूसरे के घर इतनी देर क्यों रहती हो, भूख प्यास नहीं लगती, वहीं क्यों खा लेती हो, अपने घर का खाना अच्छा नहीं लगता क्या?

अपने घर से ज़्यादा अच्छा तो आज भी किसी के घर का खाना नहीं लगता था, और 8 साल के बच्चे को कितनी भूख लगती है जानते ही हैं आप लोग पर जंगल बुक जो न कराए...खैर डरते सहमते बता दिया कि भई जंगल बुक देखने जाते हैं और फिर कीमत में आंटी के साथ खेलने बतियाने में बाकी वक़्त चला जाता है... बाबा बहुत खुश तो नहीं दिखे पर बिना किसी फैसले के उस दिन कचहरी की कार्रवाई वहीं स्थगित हो गई... अब चूंकि फैसला तो मिला नहीं था और पूछने की भी हिम्मत नहीं थी कि आंटी के घर जा सकते हैं या नहीं, पूरा हफ़्ता इसी ऊहापोह में निकला कि इस संडे मोगली देख सकेंगे या नहीं देख सकेंगे...

संडे आना था आया और फिर हुआ चमत्कार वो आंटी खुद बुलाने आ गईं कि आज तुम आई नहीं, दाएं बाएं देखा तो पता चला बाबा घर में नहीं हैं फिर क्या अप्पन तो खुश हो गए

घर के लोग भी मुरव्वत में आंटी को न नहीं कह पाए और मैं उछलती कूदती चल निकली मोगली से मिलने..

पर मेरी खुशियों पर काली माता वाला श्राप हो जैसे...

 ऐपिसोड अभी शुरू हुआ ही था कि बाबा की आवाज़ कानों में पड़ी 

इधर  वो टाईटल सॉन्ग बज रहा था जो अब भी ज़ुबानी याद है, वही चड्ढी पहन के फूल खिला है वाला... और उधर बाबा की पुकार...समझ ही नहीं आया कि फ़ोकस कहां करें लेकिन ये तो पता ही था कि बाबा कि आवाज़ को इग्नोर नहीं किया जा सकता है...

भारी मन से चड्ढी पे फूल खिलता छोड़ कर बाबा के पास पहुंची तो उन्होंने बेहद सख़्त आवाज़ में कहा चलो अंदर जाओ...

मन ही मन बाबा के जल्दी आने को कोसते हुए अंदर पहुंची तो चीख ही निकल पड़ी..

खुशी के मारे... घर में टीवी रखा था और अब अपने घर में बैठ कर टीवी देख सकती थी...मैं खुशी से नाच रही थी और बाबा मुस्कुरा रहे थे मोगली को उस छोटे से टीवी स्क्रीन पर देखा और बाबा के गालों पर थैंक्यू वाली पप्पी दी, वो टीवी ग्रैजुएशन तक सिर्फ़ मेरा रहा...मेरे कमरे में..

वो खुशी सालों बाद 4D वाले बड़े स्क्रीन के मोगली को देखकर जाने क्यों महसूस नहीं कर पाई हालांकि मोगली भी वही था और मैं भी पर कुछ था जो बिना कुछ कहे समय के साथ बदल गया था...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियां, लाल बुज्झकड़, छुट्टी छुट्टी, सुनो कहानी,मालगुड़ी डेज़, जंगल बुक, चंद्रकांता, ब्योमकेश बख्शी...  शुक्रवार वाली हिंदी फीचर फिल्म जो दो भाग में दिखाई जाती थी फिर  शनिवार की दोपहर किसी राज्य की प्रादेशिक भाषा वाली फ़िल्म जो सबटाइटल के साथ आती थी जिसे खिचड़ी के पाँच यारों का साथी ही समझिए, बचपन वाला बुद्धू बक्सा सचमें प्यारा था.. यादों की सम्पूर्ण थाती अपने में समेटता अब तो बस शो पीस की तरह लटका रहता है, घर का सबसे महंगा शो पीस बनकर...

तुम्हारी मैं

 इस पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रिय

प्रिय तुम                                                        

तुम्हें लिख रही हूँ

पर देखा जाए तो वजह कायदे से कुछ भी नहीं... 

तुमसे बात तक किए  एक अरसा गुज़र चुका है, और अब हूक की जगह सुकून ने ले ली है...

कुछ भी पाने की आरज़ू ख़त्म है हाँ पर फिर भी गले लगना चाहती हूँ कस के, तुम्हें देखना चाहती हूं जी भर के..हाँ बस इतना ही...

जानते हो मेरे पास आकाश के तारों जितने सवाल होते हैं पर तुम्हारी आवाज़ सुनते ही वो सारे सवाल खो जाते हैं कहीं... तुम डांट रहे होते हो और मैं तुम्हारी आवाज़ को घूंट घूंट खुद में जाता महसूस कर रही होती हूँ, अजीब हालात हैं शायद ज़रा बचकाना भी पर  इश्क़ बच्चा बना देता है और बेवकूफियां आपके सिर चढ़ के बोलती हैं, पूरी दुनिया के लिए मैं समझदार हूँ और तुम्हारे आगे जाने कैसे बिल्कुल बेवकूफ हो जाती हूँ

जानते हो तुम्हारी बेरूखी से बेज़ार हो कर कई बार कोशिश की कि तुम्हारे ख्याल को अपने वजूद से उतार कर परे रख दूं कई बार चाहा  कि तुम्हारी जगह किसी ऐसे को दे दूं जो आसानी से हासिल हो जाए पर हर बार हर किसी में तुम्हें ही तलाशा... तुम्हें ढूंढती रही पर तुम तो एक ही हो ...ना तुम मिले ना तुम्हारी जगह किसी और को दे पाई.. 

तुम पर आकर अटक सी गई हूं मैं ना आगे जा पाती हूँ ना पीछे ही लौट पाती हूँ...

मैं कभी सवाल नहीं करती, किसी से भी नहीं, अच्छे बुरे किसी हालात में नहीं पर तुम्हारे लिए ही मेरे सारे सवाल हैं और तुम्हारा हर जवाब मुझे तुम्हारे कुछ और करीब ले आता है...

जब कहते हो कि फीलिंग्स म्युचुअल हैं तो दिल करता सारी रवायतें उठा दूं और सब तोड़ के छोड़ के दफ़ा कर के बस तुम्हारे पास आ जाऊं फिर रोकती हूँ खुद को , ज़िम्मेदारी हैं तुम्हारे हिस्से जानती हूँ, जानती हूँ कि तुम्हारी उलझनों का आकार मेरी सारी बेचैनियों से कहीं बड़ा है मुझे अब कोई उम्मीद भी नहीं कि इस ज़िन्दगी में कभी तुम्हारे नाम को खुद से जोड़ सकूंगी पर इतना ज़रूर जानती हूँ कि मेरे अंदर जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ तुमसे जुड़ा है तुम ना भी हो तो तुम्हारे ख्यालों के साथ ज़िन्दगी जी सकती हूं... 

जब कहते हो के हमारे बीच कुछ भी नहीं तो मैं सबसे पहले खुद की आँखें देखती हूँ वहाँ जब तक तुम नज़र आओगे मैं जानती हूँ तुम हो क्योंकि जब तुम नहीं थे मैं महसूस कर पाई थी...

 जाने क्या है हर बार हर कसौटी दिल अकेले पार कर लेता है इसे किसी नियम कायदे की ज़रूरत नहीं निरा बेवकूफ जो ठहरा तो जब तक यह ना कहे कि कुछ नहीं बचा, नहीं मानूंगी...तुम्हारे कहने से भी नहीं

अक्सर लोग सवाल करते हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई है, मैं साफ कहती हूँ नहीं है क्योंकि जो हालात हैं तुम मेरी ज़िन्दगी में नहीं हो, हो भी नहीं सकते पर तुम मुझमें हो मेरी आँखों में, यादों में, धड़कनों में, हर ख़्याल में पुरवजूद पर तारी... 

मेरा इश्क़ समझते हो तुम, एक तुम्हीं हो जो ये जानते हो कि पाने खोने से इतर मैं सिर्फ प्यार में हूँ अक्सर लोग कहते हैं कोई भविष्य नहीं है मेरे इस जुड़ाव का और मैं फिर भी जानती हूँ मुझे वहीं होना है जहाँ मैं हूँ क्योंकि प्रेम है कोई म्युचुअल फंड थोड़े है कि रिटर्न्स की फिक्र करूँ

किसी के कुछ भी समझाने का फायदा अब नहीं होता, मैं इश्क में हूँ

 हाँ चलो आज सरेआम  मान भी लिया कि हाँ मैं हूँ प्रेम में और इतनी पूरी हूँ कि किसी और की गुंजाइश तक नहीं 


गणित चाहे ज़िन्दगी के स्कूल का हो या स्कूल वाली ज़िन्दगी का मैंने हमेशा कठिन चुना, जो सबको आसान लगता मुझे मुश्किल लगता और जो सबको मुश्किल लगता मैं वही सवाल ठीक ठीक सुलझा कर आती, इस तरह अपनी ज़िन्दगी में कभी कुछ भी आसान नहीं चुनने वाली रही हूँ मैं, और शायद तभी तो तुम हो मेरे लिए ...


भौगोलिक समीकरणों में चाहे तुम कहीं भी हो पर मुझमें सिर्फ तुम हो थे रहोगे ताउम्र, और साथ ही रहेंगी मेरी बेवकूफियां... ऐसी ही हूँ मैं और रहूँगी हमेशा सिर्फ़ तुम्हारी होकर...         

 तुम्हारी और सिर्फ़ तुम्हारी-मैं

इंसान हैं हम सामान नहीं

 तुमने वन नाइट स्टैंड पर बात की मतलब तुम अवेलेबल हो, रात 11 बजे के बाद ऑनलाइन हो तो अवेलेबल हो, किसी को फोन नंबर दे दिया बात कर ली तो अवेलेबल हो , खुले आम शराब की बात कर रही हो तो अवेलेबल हो, हँस के बतिया ले रही हो तो अवेलेबल हो, आगे बढ़ के गले लग ले रही हो तो अवेलेबल हो, तुम्हारी अधिकतर पोस्ट स्त्रीवादी है, माय बॉडी माय च्वॉइस कि हिमायती भी हो तो मतलब एक दम्म अवेलेबल हो, सिंगल मदर हो तो अवेलेबल हो, शादी में दिक्कत है तो अवेलेबल हो, प्रेम प्यार इश्क़ मोहब्बत पर भी लिख लेती हो तो अवेलेबल हो, तुमसे फलाने ने बदतमीज़ी की मतलब तुम अवेलेबल हो, अवसाद का शिकार हो तो कंधों की ज़रूरत होगी यानि अवेलेबल हो, मुझसे तो आज तक ऐसी कोई ओछी बात किसी ने ना की मतलब तुम ही अवेलेबल हो, स्क्रीनशॉट लगा रही हो तुम्हें ही क्यों आए मैसेज यानि अवेलेबल हो फेसबुक पर एक साथ इतनी पोस्ट करती हो तुम्हारी लाइफ नहीं कोई लगता है वाओ यानि अवेलेबल हो , अनजान लोगों से दोस्ती कर लेती हो यानि अवेलेबल हो, इतना टिपटॉप सज संवर के रहती हो तो अवेलेबल हो,लिव इन मे रह रही हो तो अवेलेबल हो और भी ब्ला ब्ला ब्ला


मतलब जानती हो कि ये सब करोगी तो अवेलेबल ही मानी  जाओगी फिर भी ये सब करती हो तो सौ प्रतिशत isi मार्क के साथ यूनिसेफ यूनेस्को से प्रमाणित तौर पर अवेलेबल हो, अवेलेबल हो, अवेलेबल हो....hence proved अवेलेबल हो...


जानती हो ये सब तुम, तो करती क्यों हो ये सब अवेलेबल हो इसीलिए ना, लोगों को तुमसे ही तो हिम्मत मिलती है लड़कों /आदमियों को तुम्ही ने तो जताया था कि तुम अवेलेबल हो...


ये वो जुमले हैं जो मैंने, आपने, हम सब औरतों ने कभी ना कभी ज़रूर सुना होगा (हमें तो कभी किसी ने कुछ नहीं कहा मतलब जिन्हें कहा वही अवेलेबल थी बताने मत आना प्लीज़)


तो बैक टू द पॉइंट पहली बात ये कि औरत हैं हम पार्लेजी का बिस्कुट नहीं जो अवेलेबल हों

 हम अगर किसी भी मुद्दे पर बात भर कर लें तो हम अवेलेबल मान लिए जाएंगे आपके ये मान लेने पर आप पर सवाल भी नहीं उठेंगे...क्यों? सिर्फ़ इसलिए कि आप आदमी हैं?? रात के ग्यारह बजे हम ऑनलाइन हैं ये देखने आप भी तो जग ही रहे तो इस आधार पर हमारा कैरेक्टर ऐसेसनेशन ही क्यों आपका क्यों नहीं? रात पी ली थी तो बहक गया था ये कहके आप पाक पवित्र हो लिए और जिसके इनबॉक्स में आप घुसे थे वो छिनाल,क्यों? 

शादी नहीं ठीक किसी की तो आपको बाबा बनने क्यों जाना है? क्यों तीसरा बनना है? क्यों जानना है कि औरत और उसके पति के बीच संबंध कब बने थे? क्या साबित होगा इससे, कि वो अवेलेबल है आपकी कुत्सित मानसिकता और ज़लील इरादे पूरे करने के लिए ?

इन सभी सवालों को किसी भी औरत से पूछने से पहले अपने गिरेबान में झांकिए कि आप कितने दूध के धुले हैं, औरतें हमेशा से इज़ी टारगेट हैं, इमोशनल हैं (हाँ एक्सेप्शन से इनकार नहीं है मुझे पर उनका प्रतिशत कम ही है) इंसान नहीं सही औरत तो समझिए उसे, आपके समकक्ष ही है वो भी, हाड़ माँस की बनी एक इंसान जिसमें बुराइयां उतनी ही स्वाभाविक हैं जितनी एक पुरूष में, प्रेम में वो भी पिघलती है, समर्पित होती है, कोई नापसंद कर गई हो तो उसका मतलब आपका मेल ईगो हर्ट करना नहीं चुनने के अधिकार का इस्तेमाल करना होता है, बेबाकी से वो किसी भी चीज़ के बारे में अगर बात कर ले रही तो मतलब वो इन टैबूज़ से ऊपर उठ चुकी है, उसके जीवन में सबकुछ सही नहीं है तो मतलब वो लड़ना संघर्ष करना सीख रही है, कहते हैं ना आप कुछ भी करें आपकी गलतियां और रास्ते में आई चुनौतियां ये बताती है कि आप काम कर रहे, तो ये मानिए कि वो अपने आसपास खींचे गए गोले से या तो निकलना चाह रही या उस गोले को बड़ा कर रही सांस लेने लायक...

आप पुरूष हैं और इस पितृसत्तात्मक दुनिया में ज़रा प्रिविलेज्ड भी हैं तो दोस्त बनिए, हाथ थामें या चाहें तो पीछे हैं ये आश्वासन भर दें, ना तो मैं प्रेम करने से मना कर रही ना सेक्स को टैबू बना रही बस इतना कह रही कि 

1.अवेलेबल का टैग देना बंद कीजिए, हम इंसान हैं,औरत हैं सामान नहीं।

2.पौलीगेमी या एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर भी चरित्र का मसला नहीं हैं भरोसे, कम्फर्ट, पारदर्शिता, संतुष्टि और खुशी आदि का मसला हैं।

3. सेक्स पर बात करने भर से न तो औरत सेक्स के लिए अवेलेबल है ना ही  कैरेक्टरलैस, ये चरित्र का पैमाना नहीं है, नहीं होना चाहिए।

4. अपनी मर्ज़ी से लिव इन में रहने वाली, अपना पार्टनर चुनने वाली या, जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाली औरतें ना तो रंडी हैं ना छिनाल और ना ही कोई सामान जिसे रखा जाए।


तो औरत को सामान की तरह अवेलेबल मानना बंद कीजिए उसे देवी समझने की कोई ज़रूरत नहीं है बस इंसान समझिए, उतना काफ़ी है, उसकी पूजा करने की कोई ज़रूरत नहीं उसका सम्मान करने की ज़रूरत है, अपने से ऊपर नहीं बराबर मानना है उसे... 


बस इतना ही...



हम दोगले लोग

 काली हो, मोटी हो, पतली हो झाड़ू की सींक जैसी हो हथिनी हो, ड्रम हो, रंग दबा है, चेहरे पर दाग हैं, नाक फूली हुई है, चिपटी है, आँखें छोटी है, नेपालियों जैसी है, चिंकियो जैसी है, बाल झड़े हुए हैं, सफ़ेद हैं, झाड़ू हैं, इतनी काली है कि जैसे मनहूसियत..और भी कितना कुछ...

दिल को छलनी करती फब्तियां और उसके बाद ये ऐक्सक्यूज़

-अरे बुरा मान गए क्या मज़ाक था यार इट्स ओक्के ना...

-तुम क्या किसी को कहोगी भैंगी जैसी तो शक्ल है तुम्हारी..

-उसको तो राह चलते कोई छेड़ेगा भी ना (ये सबसे भयानक टिप्पणी सुनी थी मैंने एक महिला के लिए और शर्मिंदा हूँ यह कहते हुए कि कहने वाले लोग प्रबुद्ध वर्ग का हिस्सा थे, पढ़े लिखे थे)

कहाँ कह पाए हम कि बॉस नो, ईट्स नॉट ओक्के, ईट्स नॉट ओक्के ऐट ऑल...

कितना मामूली है ना ये सब , कितना आम, किसने नहीं कहा होगा? शायद हम सब ने कहा है, कभी ना कभी, कहीं ना कहीं...कभी ठहाकों में तो कभी शायद गुस्से में, ईर्ष्या से या शायद ऐसी ही किसी भावना से,  तो क्या हम सब अपराधी हैं?

 हाँ, यही कड़वा सच है...हम अपराधी हैं...


दिन भर में ना जाने कितनी ही बार हम ऐसी मौखिक हिंसा  करते हैं। गाहे ब गाहे एक इंसान को उसकी शारिरिक संरचना के आधार पर तौलते हैं हम...

एक इंसान के तमाम गुण दोष किनारे रख कर उसे जज करने का एक मात्र मापदंड रह जाता है उसका फिज़िकल अपीयरेन्स... वो फिज़िकल अपीयरेंस जिसके अच्छे बुरे होने पर किसी का भी अधिकार ही नहीं है, उसे लेकर किसी को कोसना, जज करना....क्या ये न्याय है?... सोचिए!


 औसत लोग इसका शिकार भी होते हैं... हाँ होते हैं और खूब होते हैं, चिंता मत कीजिए मैं कोई दुःख भरी दास्तान सुना के आपको बोर नहीं करूंगी क्योंकि मैं जानती हूँ एक मेरे कहने से क्या ही बदल जाएगा? 


आप नहीं हुए शिकार, तो आपको बधाई आप प्रिविलेज्ड हैं...


पर कभी सोचा है कि आपका यूं ही किया गया एक मज़ाक किस तरह किसी की इंडीविजुअलिटी की धज्जियां उड़ा देता है, किस तरह किसी के आत्मविश्वास को तार तार करता है, किस तरह एक इंसान से जीने की इच्छा मात्र छीन लेता है...

पूरी ज़िन्दगी भेदभाव के बोझ के नीचे दबकर जीने वाली आधी जनसंख्या या तो फेयर एंड लवली के पीछे दौड़ती दिखती है या ग्रीन टी के पीछे जीभ लपलपाते हुए। 

खूबसूरत होने के इतने तय पैमाने हैं, इतने सारे पैरामीटर्स कि बंदा पैराशूट ले कर हवाई जहाज़ से तो फिर भी कूद ले पर इन पैरामीटर्स के अनुसार सो कॉल्ड खूबसूरत हो सके, असंभव है...

ब्यूटी होल्ड्स इन द आईज़ ऑफ बीहोल्डर ये सब हमने पढ़ा और फिर भूल गए..


और इन सबके बीच सबसे बड़ी विडंबना तब होती है जब किसी भेदभाव के खिलाफ वो लोग खड़े दिखते हैं जो पूरी ज़िन्दगी इस मौखिक हिंसा का हिस्सा रहे हैं..


फिर एक घटना घटती है,  किसी बड़े से देश के छोटे से कोने में और सबकी सोई इंसानियत जाग जाती है...


अजीब हिप्पोक्रेट्स हैं हम…..आला दर्जे के..

वो पगली लड़की

 और धीरे धीरे तुमने अपनी ही बनाई तस्वीर अपने ही हाथों से मिटा दी, 

डबडबाई आँखों से वो तुम्हें ताकती रही और तुम बर्बरता से हर रंग मिटाते गए, खुरचते रहे...

 जानते हो उसकी बड़ी बड़ी पनीली आँखें अब भी अपनी गलतियों का हिसाब माँगती हैं...उसकी घुटी हुई चीख का दम घोंटता शोर तुम सुन सकते हो न...

पर क्या ग़लती सच में उसकी थी? या तुम्हीं ने रचा था चक्रव्यूह जिसमें वह छटपटा के रह गई?


सच कहना, क्या वाकई तुममें है इतनी कूवत कि तुम उसके किसी सवाल का सामना कर सको, वो हौसला कहाँ से लाओगे कि उसकी झुकी नज़रों के आगे तन के खड़े हो सको...ज़ुबान लड़खड़ा नहीं जाएगी तुम्हारी ... 

शायद  इसलिए तुम चुप हो जाते हो,है न...


अफ़सोस सिर्फ़ इतना है कि तुम्हारे साथ तुम्हारी ही चुप्पियों का लबादा उस पगली लड़की ने भी ओढ़ लिया है...वो किसी से कुछ नहीं कहती बस घुटती रहती है, घुलती रहती है...


उसकी चुप्पी तुम्हें भी पिघला देगी, तार तार कर बिखेर देगी..सब जानते हो तुम...

हाँ अब तुम जानते हो चुप्पियों की चुभन सबसे ज़्यादा मारक होती है...सबसे ज़्यादा...


और मैं, मैं बनूँगी इन सबकी गवाह , आप भी....हम सब बनेंगे...महज़ मूकदर्शक... बेहद कमज़ोर और टूटे फूटे लोग हैं हम, है न???

गालियाँ और हम

चाभी खुशयों वाली

 हमने खुशियों के भी रेज़्यूमे बना रखे हैं मतलब एलिजिबिलिटी क्लौजेज़... ऐसा हुआ तब खुश होऊंगा वैसा हुआ तो बहुत खुश होऊंगा वरना गुप्पा बन के बैठा रहूंगा, नौकरी मिल गई तो खुशियों की चाभी हाथ लग गई, खुदा ना खास्ता चली गई तो जैसे ज़िन्दगी ही चली गई... प्रोफेशनल पर्सनल हर जगह हमारे नियम कानून बंधन... मुझे तो लिखते हुए भी घुटन महसूस हो रही...हमने नियमों के तौर पर मकड़ी के जाले बुने हैं और खुद ही उसमें फंस के रह गए हैं...


कभी कभी सोचती हूँ कि खुद को आज़ाद कर देना इतना मुश्किल कैसे है? दुःखी हो परेशान हो तो कोई प्यारा सा गाना गुनगुना लो, तेज आवाज़ में अपना पसंदीदा डांस नंबर लगा के पसीना आने तक नाच लो, किसी बच्चे से बात कर लो, कोई प्यारी सी फ़िल्म देख लो या किसी बेहद पुराने दोस्त से बात कर लो और ये सब कुछ भी समझ ना आये तो ये अदरक वाली चाय या एक मग कॉफ़ी है ना ..... यकीन मानो बस यही इतना ही चाहिए था ज़िन्दगी से... मुठ्ठी भर सुकून...


अक्सर देखती हूँ लोग सक्सेस स्टोरी बताते हैं या असफलता का अफ़सोस जताते हैं पर मुझे लगता है सबसे ज़रूरी है यात्रा.... एक ऐसी यात्रा जिसमें सब है गिरना उठना टूटना फूटना बिखरना रोना थकना बल्कि सब कुछ....सफलता असफलता भविष्य के गर्भ में है तो उसे वहीं छोड़ देना चाहिए...


मैं इम्प्रैक्टिकल या अव्यवहारिक लग रही? हो सकता है, हाँ ठीक है मानती हूँ मुश्किलें हैं और तमाम हैं पर जीवन को कोसने या ख़त्म करने से मसले नहीं सुलझ सकते ना...जीवन को ख़त्म कर देना समाधान कैसे है, मैं यह आज तक नहीं जानती हूँ ... हर किसी को अपनी समस्या बड़ी लगती है मुझे भी लगती है जब वो मुंह बाए मेरे आगे खड़ी होती है, पर जानती हूँ करने से होता है नहीं करने से अपने आप कुछ भी नहीं होना है..हर मुश्किल अपने हिस्से की कोशिश डिज़र्व करती है...

हाँ  निराशा सब ख़त्म कर सकती है तो कुछ दोस्त कुछ ऐसे अपने हमेशा पास होने चाहिए...जो बेशर्त कहें डरो मत , मैं हूँ ना सब ठीक हो जाएगा... तुम खुद कर लोगे सब कुछ... और खुद को बताते चलना भी ज़रूरी कि सब ठीक हो जाएगा... ऑल इज़ वैल... 

सारे टंटे ही जीवन के हैं, ज़िन्दगी ही ना हो फिर क्या ही दुःख... 

मौत के बाद का दिन किसने देखा है??? 

तो ज़िन्दगी जीते रहनी चाहिए क्या पता कल क्या हो...तो बेशर्त ख़ुश होना चाहिए, मुस्कान ढूंढनी चाहिए...



खिड़की वाली लड़की

 वो दो जोड़ी बड़ी बड़ी पनीली आँखें जिनमें मुद्दतों की नमी भरी हुई सी लगती है.. उस छोटी सी खिड़की के बाहर दूर तक जाती कच्ची पक्की सड़क को घंटों निहारती रहती हैं, जैसे ये उनका पसंदीदा शग़ल हो ...


 गोल चेहरे और रंगे हुए भूरे बालों वाली लड़की कि हर वक़्त डबडबाई सी वो आँखें ही तो थीं जो उसे भीड़ से अलग करती थीं...  


और बस उन्हीं आँखों ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा था, खुद में ही खोई रहने वाली मैं उसकी तरफ़ बरबस ही खिंचती चली गई, अक्सर देखती हूँ अपने आगे से छोटे कटे हुए बालों को वो बार बार अपने कान के पीछे खोंसने कि नाकामयाब कोशिश करती है और माथे पर गिरते अपने ही लटों से खीजते हुए उन्हें अंदर की तरफ मोड़ कर लम्बे बालों के साथ बाँध  देती है....

उसकी खीज ऐसा करते हुए उसकी आँखों में उतर आती है जैसे किसी बेहद तल्लीनता से किए जा रहे काम को करने में व्यवधान डाल दिया गया हो

बाधाओं को पार कर लड़की फिर से सड़क निहारने लगती है...


मुझे पुख्ता तौर पर तो नहीं पता पर लगता है जैसे उसे इंतज़ार है किसी का... जिसे वो बहुत मन लगा कर करती है, हर बार गेट के खुलने कि आवाज़ या किसी भी तरह के खटके से वो चौंक जाती है और उसकी पुरकशिश आँखें किसी को तलाशने लगती हैं ...


उसे देखते हुए कई बार सोचती हूँ कि किसी का इंतज़ार करना  कितना मुश्किल उदासी और सब्र भरा काम है...नीरस उबाऊ और अनवरत... कैसी कसक कैसी हूक सी उठती होगी ना दिल में जब आप एक बार मिलने या झलक पाने की उम्मीद में लगातार किसी की राह देख रहे हों... सबकुछ उस आने वाले कि मर्ज़ी से होना है और इस अंतहीन इंतज़ार के ख़त्म होने की उम्मीद भी उसी शख़्स की कायल है... ये सोच मुझे भी घुटन से भर देती है...क्योंकि कुछ ना कर पाने की टीस से बुरा कुछ नहीं हो सकता...


बस इतना कि अगर वाकई इस कायनात को चलाने वाली कोई ताकत मौजूद है तो ऐसा कोई भी अंतहीन  इंतज़ार किसी की दुश्वारी न बनने की दुआ माँगती हूँ...आमीन...

ये माया है

 साल 1993 केतन मेहता के निर्देशन में एक फ़िल्म बनती है, राज बब्बर और फारूक शेख जैसे कद्दावर अभिनेताओं के साथ आते हैं शाहरुख खान, सितारा नहीं अभिनेता शाहरुख, फ़िल्म की यूएसपी है उसका बोल्ड सीन, न्यूडिटी और अश्लीलता के बीच की महीन रेखा को फ़िल्म बचा ले जाने में कामयाब रहती है और नेशनल अवॉर्ड तक ले जाती है। क्रिटिक प्रशंसा से थक नहीं रहे होते... फ़िल्म का नाम...

नहीं अभी नहीं बाद में बताऊंगी..अभी  के लिए माज़रत...


फ़िल्म की कहानी अडॉल्ट्री यानि विवाहेत्तर संबंध पर बेस्ड है जिसे एक फ्रेंच नॉवेल 'Madame Bovary' के आधार पर बनाया गया है।

90 के दशक में ऐसी खूबसूरत फ़िल्म रचना जिसे आप किसी आधार पर खारिज़ ना कर सकें बहुत दिलेरी का काम था। दिलेरी इसलिए क्योंकि ये वही दौर था जब ममता कुलकर्णी को अश्लीलता के लिए आजीवन बैन कर दिया गया था। 

दीपा जो केतन की पत्नी भी हैं, की यह पहली फ़िल्म थी जिसमें उन्होंने न्यूड सीन दिया है और बावजूद इसके वो अपनी अदाकारी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार ले जाती हैं... ये आश्चर्य ही है क्योंकि इसके ठीक दो साल बाद यानी 95 में ममता कुलकर्णी पर हाफ न्यूड फोटोशूट के लिए हाई कोर्ट में केस हुआ ... न्यूड सीन होने के बावजूद फ़िल्म को देखकर एक पल को ये नहीं लगता कि ये सीन अनर्गल है। 


अपनी बोल्ड कहानी के कारण ही नहीं ये फ़िल्म खास है अपने तकनीकी पक्ष के कारण भी। 90 के दशक में हर सीन की परफेक्ट लाइटिंग, फोकस और तकनीक का आर्टिस्टिकली पर्फेक्ट होना वाकई ताज्जुब है क्योंकि एक तो इसकी समझ और एक्सपेरिमेंट की यह भूख बॉलीवुड में तुलनात्मक तौर पर कुछ कम ही मिलती है(अपवाद हैं और इसलिए वे लीजेंड्स हैं तो नो ऑफेंस प्लीज़) और दूसरा यह कि स्टिल फोटोज़, ऐंगल, ब्लर बैकग्राउंड सब सटीक और भीतर तक उतरते हैं जो उस दौर के लिहाज से वाकई बेजोड़ हैं सच कहूँ तो अब भी...

 

फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती हैं अदाकारा दीपा साही जो पूरी फ़िल्म में एक कड़ी के तौर पर काम करती हैं,वो कड़ी जिससे आप एक पल को नज़र नहीं हटा पाते, संदली सी रंगत बोलती हुई सी आँखे, गर्ल नैक्स्ट डोर वाली मुस्कान और आखिर में एलीटनेस वाला दर्प और क्लास...

दीपा का किरदार है एक ऐसी औरत का जिससे सब प्यार तो करते हैं पर अपना पाने या बांध पाने का साहस नहीं कर पाते, जिसे प्रेम की आंच के अलावा और कुछ पिघला नहीं सकता, समाज के नियमों कानूनों को धता बता कर भी ये ज़हीन लड़की खुद से नफ़रत नहीं होने देती, वो गाती है लिखती है और प्रेम करती है...पर भरोसे की बिसात पर हर बार छली जाती है, उसके ख़्वाब बड़े हैं वृहद आकाश जितने बड़े, जिसे उसके प्रेमी कभी पूरा नहीं कर पाते, ग़लत सही की उहापोह में वो हमेशा दिल की सुनती है...मात खाती जाती है उसे या तो प्रेमी मिलते हैं या साथी ही दोनों को एक साथ पाने की उसकी जुस्तजू बनी रहती है... 

अपना क्लास मेंटेन करने को उधार पर जीती इस लड़की पर आपको पूरी फ़िल्म के दौरान प्यार आएगा, सहानुभूति होगी, शायद गुस्सा भी आए ठीक उसी वक़्त समानांतर में ज़िन्दगी को लेकर उसकी महत्वकांक्षा आपके दिल में भी एक हूक सी पैदा कर दे लेकिन अपने सीधे सादे पति से धोखा करते इस किरदार के लिए आप अपने मन में वितृष्णा का भाव चाह कर भी नहीं ला पाएंगे।

 दीपा अपने इस किरदार के साथ पूरा न्याय करती हैं। अपनी कटीली भवों को तनिक सा ऊंचा नीचा करके किरदार के मन के भावों को उकेर ले जाने का माद्दा वो पूरी फ़िल्म में बखूबी साबित करती हैं। वॉयलिन की धुन की तरह कहीं भीतर उतरते हुए पूरी फ़िल्म अगर सिम्फ़नी सी लगती है तो मैं इसके श्रेय का एक बड़ा हिस्सा दीपा के नाम करना चाहूँगी। इस विषय पर बॉलीवुड में बनी फिल्मों में यह सबसे शानदार फ़िल्म कही जा सकती है हालांकि देवानंद और वहीदा रहमान की गाइड भी इसी विषय पर है पर अंत में अध्यात्म का जुड़ जाना , मेरे लिए इसे आम आदमी की फ़िल्म नहीं रहने देता...


फ़िल्म बॉलीवुड में बनी थी तो कुछ क्लीशे होने तय थे, तार्किक तौर पर वे सीन इतने उथले थे कि पूरी फ़िल्म का सिंक टूटता सा लगता है। उदाहरण के तौर पर हीरोइन की उड़ती साड़ी, पहाड़ के खूबसूरत पर रिपिटेटिव स्टील्ज़ और बेवजह को ठूँसा हुआ गाना, गाना इतना गैर ज़रूरी था कि मुझे बोल तक याद नहीं.. मैं फ़ास्ट फॉरवर्ड कर गाना ख़त्म कर देती हूं.. फिर भी इस फ़िल्म के गानों को खारिज नहीं किया जा सकता। 

करें भी कैसे गुलज़ार के शानदार मौजूँ अल्फाज़ लता मंगेशकर के छोटे भाई हृदयनाथ मंगेशकर के दिलकश संगीत और खुद लता मंगेश्कर की आवाज़ के साथ आप ऐसी गुस्ताखी कर ही नहीं सकते...


एक तरफ जहाँ टाइटल ट्रैक 'एक हसीन निगाह का साया' आपके ज़हन में लंबे वक़्त तक पैठ बनाए रखता है तो दूसरी तरफ 'खुद से बातें करते रहना' गीत किसी मायावी किले से आती हिप्नोटिक आवाज़ लगता है, 'मेरे सिरहाने जलाओ सपने' गीत तो किसी काली शक्ति के जादू सा आपके पूरे वजूद पर असर करता है...जिसके खत्म होते होते आप इसके ऐडिक्ट हो जाते हैं, इस गाने को मैं रिपीट मोड पर सुनती हूँ और ये जादू घूंट घूंट अपने भीतर पहुंचता महसूस करती हूँ...


रघुवीर यादव ओम पुरी से लेकर परेश रावल तक सब इस फ़िल्म में ठीक उसी तरह काम करते हैं जैसे किसी पज़ल को जोड़ते समय उसके छोटे फिर भी ज़रूरी हिस्से, जिनके बिना यह फ़िल्म पूरी नहीं होती और हो भी जाती तो वो नहीं होती जो यह थी...


फ़िल्म ख़त्म होती है  मुख्य किरदार यानी दीपा साही की मौत से, मुख्य किरदार यानी फ़िल्म का नाम,  जिसे अब तक समझा जा चुका होगा फ़िल्म थी 'माया मेमसाब'...हाँ यह फ़िल्म माया की है हर उस माया की जो महत्वकांक्षाओं की आग में खुद को झोंक देती हैं...

ये माया भी  किसी ज़हर से नहीं मरती, वो मरती है अपनी ही महत्वकांक्षाओं से। 

कड़वा सच है कि प्रेम हमेशा रोमानी नहीं रहता, वास्तविकता के धरातल पे एक वक़्त के बाद उबाऊ, बोझिल बेरंग हो के ख़त्म हो जाता है,आपकी महत्वकांक्षा यहां मर जानी चाहिए ना मरे तो पीछे रह जाता है महज़ दंश, चुभने के लिए...  माया प्रेम की उसी महत्वकांक्षा के दंश से  श्रापित हो मौत की हो जाती है... ज़िन्दगी की औकात भी नहीं थी माया से पार पाने की..


फिर बैकग्राउंड में वही गीत बजता सुनाई पड़ता है...

"जादू है जुनून है कैसी माया है...

ये माया है..."


और मैं सोचने लगती हूँ... कितनी ही माया यूं ही चली जाती हैं..रंगबिरंगे काँच के टुकड़ों जैसा जीवन जीकर ....जिनकी ना तो रौशनी उनकी होती है ना उनकी चमक का वजूद ही.. सही ग़लत से परे दिल की सुनने की कीमत चुकाकर...वही दिल जिसे पाँव की ज़मीन से ज़्यादा ऊंचे आसमान की चाहत है...

मेरा शहर मेरी काशी

 बनारस, काशी , वाराणसी 

हाँ ये मेरा शहर है वो शहर जहाँ मेरी आत्मा रहती है ...

सीधे सीधे कहूँ तो हम लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में हैं... मैं शहर में रहूँ ना रहूँ यह शहर मेरे भीतर हमेशा धड़कता है..

हाँ बीच बीच में मैं कई शहरों से गुज़रती हूँ पर मजाल है यह शहर एक पल को मेरा हाथ छोड़े... कहते हैं आप किसी शहर में तब तक नहीं जा पाते जब तक वो शहर आपको ना बुलाए और आज छः साल हुए भेंट को... पर जाने क्यों रूठ सा गया है...जानती हूं बुलाएगा और जब बुलाएगा तो मान मनुहार कर मना ही लूंगी..


आह! 'बनारस' जब कहती हूँ तो एक अलग ही तृप्ति से तर होती हूँ, जेठ की दोपहरी में कभी सुराही का ठंडा मीठा पानी पिया है आपने हाँ बिल्कुल वैसा ही शीतल, आत्मा तक अपनी उंगलियों से अपना नाम लिखता हुआ सा...


हाँ जानती हूँ ये शहर  मरघटों का शहर है, मृत्युस्थली है, मरने आते हैं लोग यहाँ, फिर भी डराता नहीं अपने सम्मोहन से खींचता है...


मेरे घर के ठीक बगल में मुमुक्षु भवन है, वही जगह जहाँ लोग मौत का इंतज़ार करने आते हैं... और यकीन मानिए बनारस किसी को निराश नहीं करता इसके पास सबके लिए दो गज ज़मीन और चंद लकड़ियो का जुगाड़ है... 

आडंबरों से कोसों दूर औघड़ों का शहर, जीवन से परे मृत्यु से मोह का शहर, हर मोह को साध चुका, ज्ञान के निर्वाण का शहर, वो शहर जहां बुद्ध ठौर पा लेते हैं, वो शहर जो शिव के त्रिशूल पर बिना डिगे विद्यमान रहता है...


 इसके अपने ही फलसफे हैं अलग ही ज़िन्दगी अलग नियम कायदे यहाँ का हर बाशिंदा आपको कुछ ना कुछ सिखा के जाता है और बस इसलिए यहाँ हर कोई गुरू है...छोटा मोटा काला गोरा हर कोई, बिना भेद के, क्योंकि मेरा ये शहर भेद नहीं करता न गलियों का ना गालियों का,  मिजाज़ की मुफलिसी कि हद तो देखिए इसकी गालियाँ आपको औरत मर्द का भेद नहीं देंगी, सब बराबर है यहाँ क्या राजा क्या रंक...


अब गालियों की हुई तो गलियों की भी हो जाए...

 तंग गलियों में बंटा और अंटा हुआ यह शहर आपको सिखाता है कि जीवन की गलियां चाहे कितनी ही गूढ़ हो राह खोजो तो निकल ही जाओगे, यह शहर आपको ज़िन्दगी भर वापसी की उम्मीद देता रहता है, कि कभी गलती से अगर किसी बंद गली में घुस गए तो घबराना मत क्योंकि समझो गुरू, ये बनारस है तुम्हारा चांदनी चौक नहीं कि घुस जाओ तो राह नहीं मिलेगी, बस ज़रा मन से चार कदम पीछे जाना और देखना... वहीं हाँ ठीक वहीं एक और गली होगी...ज़िन्दगी और तुम्हें... तुम दोनों को मंज़िल का रास्ता दिखाती हुई...


मेरे इस शहर में घाट हैं और घाट घाट का पानी भी... हर रोज़ कुछ नया दिखाता यह शहर सुबह चार बजे से चौकन्ना हो जाता है, यह शहर निहायत ही शरीर भी है ज़रा सी सावधानी हटी तो आपको ठग लेगा और ठहाकों के साथ अपने ठग होने का ऐलान करेगा,बनारसी ठग तो सुने ही होंगे ना आपने...

फक्कड़ है पर कंजड़ नहीं है प्रेम खुले हाथ खरचता है ये और यकीन मानिए मेहमान नवाजी भी खूब करता है 

यह जो खुद खाएगा आपको भी देगा और क्या ही ज़बरदस्त स्वागत करेगा 

पान से आपका इस्तक़बाल करेगा और दशाश्वमेध के घाट पर कुल्हड़ वाली चाय परोसेगा, बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके अघा जाइएगा तो गोदौलिया के गोलगप्पे और चाट के चटखारों तक पहुंचायेगा, मिर्च और इमली के पानी के प्रभाव से माथे पे स्वेग की जो बूंदें उभरेंगी ना उन्हें चौक की ठंडाई से ठंडक देगा, हाथ पकड़ का नई सड़क पर हल्के मीठे मलइयो के स्वाद से स्वर्ग धरती पर ले आएगा और लंका के चौराहे पर मोटी मलाई वाली लस्सी से नवाज़ कर जीवन में ही स्वर्ग का सुख भी देगा, 

खत्म नहीं हुआ अभी, चलिए चला जाए, तो कदम तनिक तेज़ बढ़ाइए, क्या हुआ? थक गए? अरे तनिक हिम्मत और कीजिए बस ज़रा ही दूर कचौड़ी गली है तो यह शहर आपको वहाँ जलेबी दही का भोग लगवाएगा  इमरती और कचौड़ी का विकल्प भी खुला है ठीक ठीक लगा लीजिएगा पेट व जिह्वानुसार... और तनिक और आगे बढ़ कर सीता के समोसों से आपको तृप्त कर देगा...आहम आह आहा !


अस्सी के घाट पर चिलम गांजे के धुएं में मदमस्त मिलेगा आपको यह तो बीएचयू से कमच्छा तक ज्ञान के गोते भी लगवाएगा, कमच्छा पर एनी बेसेंट वाली सोसायटी है बताती चलूँ एनी बेसेंट अकेली एंग्लो इंडियन थीं जो संविधान सभा का हिस्सा बनीं..

क्या हुआ क्या लगा पढ़ लिए हो गए पंडित? अबे छोड़िए मर्दवा, बीएचयू के मधुबन प्रेम मिलन चौराहे और न्यू वीटी के चक्कर काटे बिना काहे के पंडित भए...


इसके बाद तनिक राजघाट चलिए बीएचयू के ठीक बाहर उलटी तरफ़ ऑटो स्टैंड से लीजिए ऑटो और चल निकलिए, यह बनारस का वो कोना जो अलग ही दुनिया है,  बनारस को तनिक और बनारस बनाता हुआ और फिर दूसरी ओर उलटी तरफ ज़रा गिलट बाज़ार से होकर यूपी कॉलेज की तरफ भी मुड़िए ज्ञान ही ज्ञान है यहाँ कितना बटोरिएगा बताइए 

क्या हुआ? हो गया? अरे अभी कहाँ महाराज तनिक और जी लगाइए अभी तो काशी विद्यापीठ से लेकर भारत माता का इकलौता मंदिर शेष है तो चलिए उसके भी चक्कर काट लें... 


फिर सिगरा पर ip मॉल के ठीक सामने अनामिका में फालूदा भी तो खाना है, ज़रा कान इधर लाइए, कुछ कहूँ पर कहिएगा नहीं किसी से तो सुनिए फालूदा खाते समय मेरे पहले प्यार को महसूस कीजिएगा बड़ा गहरा नाता है इस जगह से... हाँ हाँ ये शहर सब जानता है इससे क्या छिपाना सबकुछ तो पता है इसे मेरा राज़दार जो है ये और अब आप भी...


मेरा शहर पज़ेसिव नहीं है फिर भी हक़ जताना जानता है, गुड्डी पतंग उड़ाते इस शहर को खूब पता है कि ढील कहाँ देनी है और मांझा खींचना कहाँ है इसलिए तो कहती हूं कि जो इसके प्रेम में पड़ा समझो फकीर हुआ तन से बिल्कुल फक्कड़ और मन से शंकर ... यानि शिव यानि असीम अगाध विशाल...जीवन कहीं भी जियो मौत के बाद मोक्ष और निर्वाण  देकर अपने में समेट लेने वाला शहर तो यही है


अभी डीएलडब्लू और दालमंडी शेष ही है अच्छा ध्यान रखें वहाँ जाएं तो लौंगलता से लेकर  बंगाल स्वीट के रसगुल्ले का भोग ज़रूर लगाएं...वरना उतनी दूर जाना निरर्थक हो जाएगा...


थक कर सुकून की चाह है तो शाम को रीवा घाट चलिएगा वहाँ से नाव में बैठ कर साँझ की आरती देखने दशाश्वमेध चल निकलेंगे, सुकून की कोई ठौर होगी तो बस यही होगी...यकीन जानिए गंगा को गंगा के बीचों बीच से निहारने से ज़्यादा सम्मोहन तो इंद्र की किसी अप्सरा में भी क्या होगा... शंखनाद और असंख्य घंटियों के कोलाहल में टिमटिमाते दीयों के बीच शांति का वह टापू मन की तमाम झंझावतों को शांत कर देता है...


जानते हैं मेरी एक बुरी आदत है मैं सामने से जाकर हाथ नहीं थामती और थाम ही लूँ तो निभा पाना तब तक मुश्किल होता है जब तक सामने वाले से मन कायदे से ना मिले, मेरा शहर ये बखूबी जानता था, इसलिए खुद आया मुझे अंकवार करने, मुझे डोली भी इसी ने बिठाया विदा भी इसी ने किया और पहुंची भी इसी तक , जानती हूँ जब थक कर हार कर खर्च हो जाउंगी तो मेरे भीतर की रेज़गारी को समेटेगा भी यह शहर ही 


इंतज़ार है, देखें कब बुलाता है यह, सालों बीते गले लगे... अच्छा आप भी चलिएगा क्या? हमारी प्रिवेसी की फिक्र ज़रा ना कीजिएगा हम भीड़ में भी जीते हैं एक दूसरे को, वैसे भी यह शहर हर रोज़ की मौतों के बीच भी जीना जानता है तो फिर प्रिवेसी कौन बड़ी बात...

फिर यही तो प्रेम है..


 मुझसे पूछिएगा कि कब पता चला मुझे मेरे इस इश्क़ का तो ठीक ठीक बता नहीं पाउंगी क्योंकि ये धीरे धीरे उपजा प्रेम है जिसका रंग समय की आँच पर मद्धिम मद्धिम गाढ़ा होता है... ये इश्क़ हमेशा से तो नहीं था, इस शहर ने यह कमाया है... मेरे भीतर यह शहर पनपता है बिल्कुल मंथर गति से... इस शहर ने मुझे समझा है बनाया है और वक़्त बेवक़्त संभाला भी है, इसकी ईमानदारी और खरापन मेरी पूंजी है, बनारस जो महज़ शहर नहीं मेरा साथी है प्रेम है, मोह है और मोक्ष भी...मैं इसके इश्क़ में मुब्तिला हूँ गिरफ्तार हूँ ...हाँ आज़ादी की हद तक...


*तस्वीरें गूगल से साभार

कॉफ़ी मग और फ़िल्म

 मेरे हाथ में कॉफ़ी का  मग है...रात के शायद ढाई बजे हैं…बिजलियों की गड़गड़ाहट बाहर आसमान में ही नहीं मुझे मेरे भीतर भी महसूस हो रही है, कितनी उथल पुथल मची है... जीवन के धागे आपस में कुछ उलझ से गए हैं गजब की बेचैनी सी है, उसने पूछा "क्या तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई और है" क्या कहती कि तुम्हारी तस्वीर तो मुझमें ही रहती है तुम कोई और कैसे हुए पर नाम क्या दूं तुम्हें, समझ ही नहीं पाई...तुम कहाँ नाम देश काल के बंधन में बंधे हो कभी, असीम हो तुम, तुम्हारी सीमाएं कहाँ और क्योंकर हो भला ....

तुम औऱ तुम्हारी यादों को मैं झटक देना चाहती हूँ और इनसे पार पाने के लिए ही मैं फ़िल्म देखना शुरू करती हूँ....


स्क्रीन पर रणवीर सिंह है, उसके बालों से होते हुए बर्फ़ उसके होठों को छू कर गिर रही है...मैं बर्फ की एक मोटी चादर को रणवीर और सोनाक्षी दोनों की आँखों में भी पिघलते हुए महसूस करती हूँ... फ़िल्म खत्म होने में अब कुछ ही वक़्त बचा है...यह फ़िल्म ना कोई सस्पेंस है ना थ्रिलर बल्कि शायद अंत भी मैं जानती हूं पर फ़िर भी अंत देखने का मोह नहीं छूटता, स्क्रीन पर नज़रें एकटक टिकी हैं, तभी पाखी पूछती है "क्या तुमने कभी मुझे प्यार किया था?".. रणबीर कि आँखें देख कर लगता है कि जैसे वरूण अपना दिल निकाल कर सामने रख देना चाहता है पर जैसे सबकुछ समेट कर कहता है "तुम मेरी ज़िन्दगी का वो आखिरी मौका थी जब मैं जी सकता था, मुझे सभी ने इस्तेमाल  किया, पर प्यार सिर्फ़ तुमने किया, मैं तब भी तुमसे बेहद प्यार करता था आज भी करता हूँ"

 ऐसा लगता है जैसे पाखी यानी सोनाक्षी की आँखों में सुकून उतर आया हो ..

 वरुण, पाखी से कहता है "ये ज़िन्दगी जो तुम जी रही हो, तुम्हारी नहीं है क्यों अपनी ज़िन्दगी एक पत्ते से जोड़ रखी है तुमने... पाखी कहती है "डरती हूँ  अगर यह आखिरी पत्ता भी गिर गया तो ? वरुण उसका हाथ कस कर थाम लेता है और कहता है ऐसा कभी नहीं होगा...


मैं जानती हूँ उम्मीद की कीमत क्या होती है, वरुण भी जानता है इसलिए दुनियादारी की कसौटी पर बचकानी सी  लगने वाली पाखी की मांग को वो अपने मरने से पहले पूरा करने में अपनी जान लगा देता है...

 

पाखी की उम्मीद को बचा कर रखने के लिए वरूण की वो बेचैनी मुझे याद दिलाती है ओ हेनरी की लघु कहानी "द लास्ट लीफ़" की... सालों पहले मैंने बच्चों को पढ़ाई है यह कहानी…बाद में इस फ़िल्म के बारे में पढ़ते हुए पता चला कि इस याद का आना स्वाभाविक है क्योंकि फ़िल्म का अंत वाकई इसी कहानी पर आधारित है।


फ़िल्म है 2013 जुलाई में ही रिलीज़ हुई 'लुटेरा'...जिसके कहानीकार और निर्देशक हैं विक्रमादित्य मोटवानी... फ़िल्म शुरू होती है पश्चिम बंगाल के मानिकपुर से और ख़त्म होती है डलहौजी की गलाती गिरती बर्फ़ में ...


सिनेमेटोग्राफी के लिहाज़ से यह एक शानदार फ़िल्म है जिसे अंजाम दिया है फिल्मफेयर समेत तमाम पुरस्कार विजेता महेंद्र शेट्टी ने। शेट्टी वही हैं जिन्होंने 'फैसला' और 'उड़ान' जैसी फिल्में की हैं हालांकि बतौर निर्देशक विक्रमादित्य ने भी 1950 का बंगाल बखूबी उकेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है,  चाहे वो पुरानी हवेलियां हों या विंटेज कारों का इस्तेमाल…निर्देशक की रिसर्च और मेहनत दिखाई देती है।


यूं तो फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई ना ही 100 करोड़ वाले क्लब में ही शामिल हो सकी  पर तकरीबन 27 करोड़ में बनी इस फ़िल्म ने अपनी लागत का दोगुना तो निकाल ही लिया... 


रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा के लिए भी यह फ़िल्म खास है क्योंकि इस फ़िल्म से इन दोनों ने ही अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा लिया..


 जाने क्यों पूरी ही फ़िल्म में रणबीर हीरो से नहीं लगते, महीन पतली सी आवाज़ वाला एक आम किरदार जो अपने प्रेम को पाने के लिए दुनिया से लड़ता नहीं है यानी उसमें कोई एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी हिरोइक क्वालिटी नहीं 

 पर फिर भी जैसे हर घर में कोई सुपरहीरो होता है मेरे पापा मेरे सुपर हीरो टाइप, वो जो अपनी फैमिली के लिए कुछ भी करने को राज़ी होता है, बियॉन्ड लिमिट जाके अपनी सीमाओं को चुनौती देकर...

 जिसे दुनिया भले याद करे ना करे पर वो अपने परिवार अपने चाहने वालों के दिल में धड़कता है

कुछ कुछ वैसा ही है ये किरदार हीरो नहीं सुपर हीरो वो भी पर्सनल वाला… जिस प्रेम को पाने की नाकाम कोशिश कर वो छोड़ चुका है उसी प्रेम के लिए वह ज़िन्दगी की परवाह नहीं करता..

 प्रेम को पाना नहीं…. प्रेम में बस देना, अनवरत दिए जाने वाले इस निर्मोह ने ही इस किरदार का कद बढ़ा दिया है…

अलबत्ता  मुझे, सोनाक्षी इस फ़िल्म के एक बड़े हिस्से में हीरो इमेज लगती हैं। 

फ़िल्म सच कहूँ तो मेरे मन को छूने में नाकामयाब रही, हाँ कुछ दृश्य ज़रूर शानदार हैं..जिनमें से एक सीन मैंने तस्वीरों में भी दिखाया है


किसी भी बॉलीवुड फ़िल्म में गाने बेहद ज़रूरी कॉम्पोनेंट होते हैं इस फ़िल्म के गाने जैसे मेरे इसी बारिश वाले मूड को ध्यान रख कर लिखे बुने गए हों, बाहर बारिश का शोर और भीतर दिल का… और बैकग्राउंड में बजते इसके गीत …आह! इससे ज़्यादा आप क्या ही चाहेंगे...

फ़िल्म का संगीत दिया है अमित त्रिवेदी ने... माफी की गुज़ारिश समेत  त्रिवेदी जी को लेकर मैं इतनी बायस्ड हूँ कि उनपर कुछ ना कहूँ तो ही बेहतर…

उनके लिए मैं बायस्ड क्यों हूँ ये आप इस फ़िल्म के गाने सुन कर समझ जाएंगे… और उसपर मोनाली ठाकुर, मोहित चौहान और स्वानंद किरकिरे बस यूं समझिए कि बारिश की बूंदों से ज़्यादा वाजिब और माकूल वक़्त नहीं हो सकता इन्हें सुनने का तो जाइए आप भी सुनिए और गुनगुनाइए … मैं भी चलती हूँ

आखिर यादें चुभलाना भी काम है साहब, उम्मीदतन इन गानों की गुनगुनाहट अब इसे तनिक आसान कर देगी...


*फोटोज़ गूगल से साभार

फ़िल्म के बहाने शकुंतला

 30 जुलाई को रिलीज़ हुई इस फ़िल्म को देखते हुए पूरे वक़्त हर सीन के परोक्ष में मेरे अंदर भी एक सिनेमा चल रहा था, मैं पूरे वक़्त सोचती रही कि एक माँ होने के नाते मैं खुद चाहूँगी कि कल जब मेरी बेटी मेरी तरफ़ देखे तो उसे प्राइड हो ना हो शर्मिंदगी ना हो वो मेरी तरह बनना ना भी चाहे तो भी जाने कि खुद की आवाज़ का होना कितना ज़रूरी है 


वो यह भी जाने कि हम पेड़ नहीं है हमारे पास जड़ नहीं है पैर हैं जिनका काम है दुनिया घूमना समझना और उसे जीने में मदद करना... 


सच कहूँ तो मैं इस दुनिया की सबसे बुरी माँ हूँ, और यकीन जानिए जितनी समझदार माँओं से मैं आज तक मिली उन्हें यही कहता पाया कि वे एक बुरी माँ हैं इसी संदर्भ में मुझे काजोल का वो इंटरव्यू याद आता है जिसे सालों पहले किसी न्यूज़ चैनल ने लिया था, काजोल ने इस इंटरव्यू में अपने माँ होने के अनुभव और मैनेजमेंट स्किल्स पर बात करते हुए कहा था कि हर माँ सुपर वुमन होना चाहती है उसे सब चाहिए और परफेक्ट चाहिए ना मिले ना हो पाए तो वो गिल्ट पाल लेती है... परफेक्ट ना कर पाने का गिल्ट... ऐसे में हमें खुद को माफ़ करना आना चाहिए खुद को इंसानों की तरह ट्रीट करना आना चाहिए, हम माँएं भूल जाती हैं कि हमें भी गलतियों की छूट है उतनी ही जितना किसी और इंसान को होगी 

माँ को सभी देवी कहते हैं तो हम भी मान लेती हैं कि हम माँएं त्याग की मूर्ति, प्रेम का सागर और ब्ला ब्ला पता नहीं क्या क्या हैं... पर दरअसल हम सिर्फ और सबसे पहले इंसान हैं बाद में बाकी कोई रिश्ता...


अपनी कहूँ तो मेरी बेटी महज़ तीन साल की भी नहीं थी जब दूसरी पारी की शुरुआत कर मैंने कमाना शुरू किया था। आप मुझपर तोहमत लगा सकते हैं की इतनी छोटी बच्ची के साथ कमाना क्यों था मुझे, पर कमाना ज़रूरी था मेरे लिए, क्योंकि काम करने से प्यार था मुझे...


खैर,ऐसे में स्कूल जॉब से बेहतर क्या होना था तो शुरुआत हुई...


फिर एक दिन हुआ यूं कि डेढ़ सौ बच्चों की क्लास में मेरी आवाज़ को फॉलो करते हुए, जाने कब बेटी अचानक स्टेज पर आ गई, हाथ पांव ठंडे हो गए क्योंकि मैं अथॉरिटीज के ऑब्जर्वेशन में थी, नौकरी जा सकती इस एक गलती के लिए, जो मेरी थी भी नहीं, मैं नहीं जानती कि मेरी पिन ड्रॉप साइलेंस वाली क्लास को इस डिस्टर्बेंस के बाद मैंने कैसे हैंडल किया पर उस दिन बेटी को संभालते हुए, क्लास खत्म करते करते मैंने एक बात ज़रूर सीखी कि एक माँ के दिमाग का एक हिस्सा हमेशा अपने बच्चे के लिए ऑन ड्यूटी होता है वो हर काम से छुट्टी लेती है पर माँ वो हमेशा रहती है...हर परिस्थिति में, तब भी जब वो दुनिया फतह कर रही हो


हाँ तो आज की फ़िल्म भी वही कहती है जो मेरी पिछली पोस्ट कह रही थी...

 एक माँ को औरत रहने दो, इंसान रहने दो ट्रीट हर लाइक दैट..."

फ़िल्म है "शकुंतला देवी"

यह फ़िल्म सिखाती है कि किसी को ये हक नहीं बनता कि वो एक माँ को  सिखाये सवाल करे या बताए कि उसे अपना बच्चा कैसे पालना है...चाहे माँ शकुंतला जैसी सशक्त हो या अशक्त और मरीज हो...वो अपने बच्चे को हमेशा अपनी प्राथमिकता के तौर पर रखती है 


फिल्म की कहानी है मैथेमेटिक्स जीनियस, ह्यूमन कंप्यूटर के नाम से मशहूर और  तमाम क्षेत्रों में अपनी पैठ बना चुकी  शकुंतला देवी पर..


 कहानी नहीं बताऊंगी वो आप खुद देखिए। अब चूँकि ये ऑटोबायोग्राफी है तो कहानी तो चुस्त ही है, पर मेरे लिए ये कहानी शकुंतला देवी की ही नहीं बल्कि हर उस माँ की कहानी है जो अपने सपनों को किसी भी वजह से नहीं छोड़ती, जिन्हें पता है कि अगर वो खुश नहीं रह पाई तो अपने बच्चे को भी खुश नहीं रख पाएंगी...


 एक बेहतरीन सशक्त कहानी और कलाकारों बावजूद पूरी फ़िल्म के दौरान कई बार लगता है कि एक बढ़िया फ़िल्म बनते बनते रह गई जिसका कारण लगते हैं इसके वे दृश्य जो न सिर्फ कुछ ज़्यादा ही लंबे खिंच गए हैं , बल्कि रिपिटेटिव भी हो गए हैं

तमाम कमियों के बावजूद आपको फ़िल्म देखने का अफ़सोस नहीं होता है जिसकी वजह है इस फ़िल्म में मौजूद दमदार डायलॉग जिन्हें आप फ़िल्म के टेक अवे के तौर पर रख सकते हैं, चरित्रों के शानदार अभिनय के अलावा यही हैं जो आपको बाँध कर रख सकते हैं...


विद्या मेरी ऑल टाइम फेवरेट है क्योंकि वह अभिनय ठीक उसी तरह करती हैं जैसे मैं फिल्मों को देखती हूँ... पूरी तरह जी कर, इस फ़िल्म की भी जान हैं विद्या, हर फ्रेम में फ्लॉलेस और परफेक्ट... विद्या इस फ़िल्म का नमक वो भी बिल्कुल स्वादानुसार हैं, ना ज़्यादा ना कम...


 इस फ़िल्म में भी विद्या ने हमेशा कि तरह एक बार फिर ये साबित किया है कि वो अकेले अपने दम पर पूरी फ़िल्म उठा सकती हैं।


 शकुंतला की बेटी के तौर पर मौजूद हैं दंगल फेम सान्या मल्होत्रा, एक दर्शक के तौर पर ना जाने क्यों मुझे हमेशा उनसे थोड़े और की गुंजाइश  रहती है फ़िल्म चाहे दंगल हो बधाई हो या शकुंतला देवी 


दूसरी ओर फ़िल्म का  संगीत पक्ष बिल्कुल नहीं छूता जबकि इसके गानों को सुनिधि, मोनाली और श्रेया जैसी सुरीली गायिकाओं ने अपनी आवाज़ दी है।

 वेटिंग जैसी फ़िल्म के निर्देशन के बाद एक निर्देशक के तौर पर अनु मेनन से उम्मीद बढ़ गई थी जिसे वो इस पूरी फ़िल्म में पूरा करने की कोशिश करती दिखती हैं। एक चुस्त कहानी के बावजूद खराब स्क्रीनप्ले और टूटी कड़ियों के जुड़ने की जद्दोजहद से गुजरती यह फ़िल्म मुझे बायोपिक कम इंस्पिरेशनल मूवी ज़्यादा लगती है। इसीलिए अगर इस फ़िल्म को आप बायोपिक के तौर पर आंक रहे हैं तो मेरी तरह निराश हो सकते हैं।


कुल मिला के कहूँ तो विद्या के शानदार अभिनय और फ़िल्म के जानदार डायलॉग के लिए यह फ़िल्म कम से कम एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए

और इसलिए भी क्योंकि हर औरत के मन में यह सवाल कभी न कभी ज़रूर उठता होगा कि एक आदमी हमेशा एक औरत की ज़रूरत क्यों बनाना चाहता है, वो क्यों चाहता है कि वह उसका संबल बने,  एक औरत का प्यार मात्र उसके लिए काफ़ी क्यों नहीं हो पाता...

Sunday, 12 April 2020

लघु कथा

#एक_कहानी_ऐसी_भी

धानी ने बेहद कस के उसका हाथ पकड़ रखा था जैसे अगर किसी ने वो हाथ छुड़ा दिया तो साँसे ही घुट जाएँगी....
रेस्त्रां के उस आखिरी कोने वाली टू सीटर पर बैठी वो अपने प्रेमी को एकटक निहार ही रही थी....
अचानक... जाने क्यों, वो बोला," धानी मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ ....कभी कभी जता देना चाहता हूँ कि तुम्हारे लिए मेरे प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ किस सीमा पर है..."
धानी उसकी बातें सुनकर मुस्कुरा पाती उससे पहले ही वो बोला "धानी लाओ ना तुम्हें सिंदूर लगा दूँ..."
धानी ने अपनी बड़ी बड़ी आँखे और बड़ी कर उसे देखा....
प्रेमी की साधिकार कही गई ये बात उसपर कुछ अलग ही असर कर गई थी...

प्रेमी को अवाक सा देखता छोड़ धानी तेज़ी से रेस्त्रां के बाहर आ गई... अंदर बढ़ती घुटन से निकलने का और कोई ज़रिया था भी नहीं... अब एक मिनट और रुकना उसके लिए मुमकिन नहीं था...जाते जाते वो पलटी, पनीली आँखों से उसने अपने प्रेमी को देखा और हाथ हिला कर ऑटो रोक लिया...
-"भईया गोल मंडी ले लो" ऑटो वाले को बोलकर धानी जल्दी से ऑटो में बैठ गई....
तेज़ी से दौड़ लगाते वक्त और रास्तों को धानी भागती इमारतों के साथ भरसक पीछे धकेल रही थी...
प्रेमी के सिन्दूर वाले निवेदन पर धानी अब ये सोचते हुए मुस्कुरा रही थी कि हद होते हैं ये सारे आदमी भी सब के सब सिन्दूर चूड़ी बिंदी पर ही क्यों अटक जाते हैं? आखिर औरत है या कि ज़मीन आ टुकड़ा जिसपर आधिकार की मुहर लगाकर इनका अहम संतुष्ट हो जाता है...
आदमी चाहे प्रेमी हो या पति अधिकार वाली रजिस्ट्री की चाह उसमें कभी नहीं मरती.....

धानी ने घड़ी देखी शाम के 6 बजने वाले थे "भईया ज़रा तेज़ चलाओ ना'' कहकर धानी ज़रा उतावली सी हो गई थी....
उसे खाना बनाना था आखिर पति और बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे थे....

अल्हड़ कोशिश...


ताकि साँस ली जा सके/कविता

किसी संभावना का
किसी प्रिय संबंध का
टूटना दरकना
कहाँ होता है
अनायास
ये तो प्रक्रिया है
सतत चलती हुई
और एक दिन
सब बिखर जाता है
मेरी तरह तुम्हारी तरह
टुकड़े टुकड़े हो जाती है ज़िन्दगी
शिकायत के लिए
या कि प्रार्थना के लिए
तब नहीं जुड़ पाते हाथ
कि सब कुछ
बिखर जाने के ठीक पहले
समेट लिया जाना चाहिए
बचा ले जाने की
वो आखिरी कोशिश
कर लेनी चाहिए
कि जिसे संजोया था
सदियों तक
जान लेना चाहिए
कि संजोया नहीं था
ढोया था,यही सच है
सुनो!टूटे टुकड़े समेट कर
एक पोटली में बाँध देना चाहिए
उसी पोटली में धर देना चाहिए
यादों के खोटे सिक्के
कर आना चाहिए प्रवाहित
बहती धारा में
और हो जाना चाहिए आज़ाद
अपनी ही बेड़ियों से...
कि ताकि साँस ली जा सके...

यूं ही बैठे ठाले...मेरा घर...

मेरे लिए घर का मतलब है ज़रा सा बेढंगापन....
जो जहाँ है, वो वहीं रहे तो ये मुझे जीवन का ठहर जाना लगता है, बिस्तर की सिलवटों से मुझे बिल्कुल उलझन नहीं होती बल्कि 24 घंटे सजे संवरे घर से कोफ्त होती है,अजीब सा लगता है।
चुक्कू, यानि बेटी के बिखरे खिलौने, मेरी औंधी पड़ी किताब, कॉफी का मग और कोने में पड़ा मनी प्लांट मुझे सुकून देता है।
मेरे लिए सफ़ाई सिर्फ हाइजीन का ध्यान रखना है ना कि कोई दिमागी फ़ितूर कि हर वक़्त जिसमें उलझा रहा जाए, ठंड का मौसम हो तो बिना नहाए खाए लगातार पढ़ सकती हूँ किताबें इश्क़ हैं मेरा, फ़िल्म देख सकती हूँ-मेरे नज़दीक ज़िन्दगी का आईना हैं ये, किसी बात का अंकुश बर्दाश्त नहीं होता मुझसे-घुटन होती है, झुंझला जाती हूँ, तो बेतरतीबी मेरी आदत नहीं मेरा स्वभाव है और मेरा घर मेरी बेतरतीबियों में ही पुरसुकून रहता है...
यूं भी घर वो जगह है जहाँ आप सुकून से अपने पाँव फैला सकें...जैसे हों वैसे रह सकें, बिल्कुल वैसे जैसे आपका मिजाज़ हो बेलागलपेट, बेरोकटोक... जहाँ आप पर किसी औपचारिकता का बोझ ना हो, जहाँ मुश्किलें मिनटों में सुलझें या नहीं पर उनसे लड़ने की हिम्मत ज़रूर मिल जाए, घर का मतलब महज़ चाहरदीवारी और छत नहीं है बल्कि वो 'मी स्पेस' है जहाँ आप एक मुकम्मल शख्स बनने के प्रॉसेस में कुछ वक़्त का ठौर पा सकें...
यूं कह लीजिए कि ज़िन्दगी के खेल का टाइम प्लीज़ है घर..और ये घर किसी अपने की गोद या आपके वजूद को समेट लेती बाहें भी हो सकता है...
यूं तो बेतरतीब होने को दुनिया गुनाह मानती होगी पर मुझे लगता है कि ये बेतरतीबी ही स्वाभाविक है। दुनिया की हर शय जो ज़रा बेतरतीब है, raw है अधपकी सी है, अल्हड़ है, खूबसूरत है।
 मुलम्मे चढ़ी नफ़ासत पसंद ज़िंदगी ज़रा नकली सी हो जाती है, नहीं?? कम से कम कोई एक ऐसा कोना तो हो कि जहाँ आप तमाम नकली चेहरे मुलम्मे सबकुछ उतार कर रख ही सकते हों, हैं ना??? घर बस वही जगह है...
 हाँ मैंने देखा है लोगों को करीने से सजा बुत बनकर अपना आप खोते हुए...बस इतना कि घर अपनाइयत का मोहताज़ है, चाक-चौबंद सफाई सिस्टम का नहीं वरना घर और पाँच सितारा होटल में और फर्क ही क्या है ...
अपनी बात करूं तो जाने क्यों बिखरी सी उलझनों में मैं खुद को बेहतर तलाश कर पाती हूँ...और बस ऐसा ही बिखरा सा है मेरा घर...जहाँ रोटी की सौंधी ख़ुशबू नहीं सपनों की मद्धिम आँच रहती है....
हाँ मेरा घर....ज़रा बेतरतीब पर अपना सा....