30 जुलाई को रिलीज़ हुई इस फ़िल्म को देखते हुए पूरे वक़्त हर सीन के परोक्ष में मेरे अंदर भी एक सिनेमा चल रहा था, मैं पूरे वक़्त सोचती रही कि एक माँ होने के नाते मैं खुद चाहूँगी कि कल जब मेरी बेटी मेरी तरफ़ देखे तो उसे प्राइड हो ना हो शर्मिंदगी ना हो वो मेरी तरह बनना ना भी चाहे तो भी जाने कि खुद की आवाज़ का होना कितना ज़रूरी है
वो यह भी जाने कि हम पेड़ नहीं है हमारे पास जड़ नहीं है पैर हैं जिनका काम है दुनिया घूमना समझना और उसे जीने में मदद करना...
सच कहूँ तो मैं इस दुनिया की सबसे बुरी माँ हूँ, और यकीन जानिए जितनी समझदार माँओं से मैं आज तक मिली उन्हें यही कहता पाया कि वे एक बुरी माँ हैं इसी संदर्भ में मुझे काजोल का वो इंटरव्यू याद आता है जिसे सालों पहले किसी न्यूज़ चैनल ने लिया था, काजोल ने इस इंटरव्यू में अपने माँ होने के अनुभव और मैनेजमेंट स्किल्स पर बात करते हुए कहा था कि हर माँ सुपर वुमन होना चाहती है उसे सब चाहिए और परफेक्ट चाहिए ना मिले ना हो पाए तो वो गिल्ट पाल लेती है... परफेक्ट ना कर पाने का गिल्ट... ऐसे में हमें खुद को माफ़ करना आना चाहिए खुद को इंसानों की तरह ट्रीट करना आना चाहिए, हम माँएं भूल जाती हैं कि हमें भी गलतियों की छूट है उतनी ही जितना किसी और इंसान को होगी
माँ को सभी देवी कहते हैं तो हम भी मान लेती हैं कि हम माँएं त्याग की मूर्ति, प्रेम का सागर और ब्ला ब्ला पता नहीं क्या क्या हैं... पर दरअसल हम सिर्फ और सबसे पहले इंसान हैं बाद में बाकी कोई रिश्ता...
अपनी कहूँ तो मेरी बेटी महज़ तीन साल की भी नहीं थी जब दूसरी पारी की शुरुआत कर मैंने कमाना शुरू किया था। आप मुझपर तोहमत लगा सकते हैं की इतनी छोटी बच्ची के साथ कमाना क्यों था मुझे, पर कमाना ज़रूरी था मेरे लिए, क्योंकि काम करने से प्यार था मुझे...
खैर,ऐसे में स्कूल जॉब से बेहतर क्या होना था तो शुरुआत हुई...
फिर एक दिन हुआ यूं कि डेढ़ सौ बच्चों की क्लास में मेरी आवाज़ को फॉलो करते हुए, जाने कब बेटी अचानक स्टेज पर आ गई, हाथ पांव ठंडे हो गए क्योंकि मैं अथॉरिटीज के ऑब्जर्वेशन में थी, नौकरी जा सकती इस एक गलती के लिए, जो मेरी थी भी नहीं, मैं नहीं जानती कि मेरी पिन ड्रॉप साइलेंस वाली क्लास को इस डिस्टर्बेंस के बाद मैंने कैसे हैंडल किया पर उस दिन बेटी को संभालते हुए, क्लास खत्म करते करते मैंने एक बात ज़रूर सीखी कि एक माँ के दिमाग का एक हिस्सा हमेशा अपने बच्चे के लिए ऑन ड्यूटी होता है वो हर काम से छुट्टी लेती है पर माँ वो हमेशा रहती है...हर परिस्थिति में, तब भी जब वो दुनिया फतह कर रही हो
हाँ तो आज की फ़िल्म भी वही कहती है जो मेरी पिछली पोस्ट कह रही थी...
एक माँ को औरत रहने दो, इंसान रहने दो ट्रीट हर लाइक दैट..."
फ़िल्म है "शकुंतला देवी"
यह फ़िल्म सिखाती है कि किसी को ये हक नहीं बनता कि वो एक माँ को सिखाये सवाल करे या बताए कि उसे अपना बच्चा कैसे पालना है...चाहे माँ शकुंतला जैसी सशक्त हो या अशक्त और मरीज हो...वो अपने बच्चे को हमेशा अपनी प्राथमिकता के तौर पर रखती है
फिल्म की कहानी है मैथेमेटिक्स जीनियस, ह्यूमन कंप्यूटर के नाम से मशहूर और तमाम क्षेत्रों में अपनी पैठ बना चुकी शकुंतला देवी पर..
कहानी नहीं बताऊंगी वो आप खुद देखिए। अब चूँकि ये ऑटोबायोग्राफी है तो कहानी तो चुस्त ही है, पर मेरे लिए ये कहानी शकुंतला देवी की ही नहीं बल्कि हर उस माँ की कहानी है जो अपने सपनों को किसी भी वजह से नहीं छोड़ती, जिन्हें पता है कि अगर वो खुश नहीं रह पाई तो अपने बच्चे को भी खुश नहीं रख पाएंगी...
एक बेहतरीन सशक्त कहानी और कलाकारों बावजूद पूरी फ़िल्म के दौरान कई बार लगता है कि एक बढ़िया फ़िल्म बनते बनते रह गई जिसका कारण लगते हैं इसके वे दृश्य जो न सिर्फ कुछ ज़्यादा ही लंबे खिंच गए हैं , बल्कि रिपिटेटिव भी हो गए हैं
तमाम कमियों के बावजूद आपको फ़िल्म देखने का अफ़सोस नहीं होता है जिसकी वजह है इस फ़िल्म में मौजूद दमदार डायलॉग जिन्हें आप फ़िल्म के टेक अवे के तौर पर रख सकते हैं, चरित्रों के शानदार अभिनय के अलावा यही हैं जो आपको बाँध कर रख सकते हैं...
विद्या मेरी ऑल टाइम फेवरेट है क्योंकि वह अभिनय ठीक उसी तरह करती हैं जैसे मैं फिल्मों को देखती हूँ... पूरी तरह जी कर, इस फ़िल्म की भी जान हैं विद्या, हर फ्रेम में फ्लॉलेस और परफेक्ट... विद्या इस फ़िल्म का नमक वो भी बिल्कुल स्वादानुसार हैं, ना ज़्यादा ना कम...
इस फ़िल्म में भी विद्या ने हमेशा कि तरह एक बार फिर ये साबित किया है कि वो अकेले अपने दम पर पूरी फ़िल्म उठा सकती हैं।
शकुंतला की बेटी के तौर पर मौजूद हैं दंगल फेम सान्या मल्होत्रा, एक दर्शक के तौर पर ना जाने क्यों मुझे हमेशा उनसे थोड़े और की गुंजाइश रहती है फ़िल्म चाहे दंगल हो बधाई हो या शकुंतला देवी
दूसरी ओर फ़िल्म का संगीत पक्ष बिल्कुल नहीं छूता जबकि इसके गानों को सुनिधि, मोनाली और श्रेया जैसी सुरीली गायिकाओं ने अपनी आवाज़ दी है।
वेटिंग जैसी फ़िल्म के निर्देशन के बाद एक निर्देशक के तौर पर अनु मेनन से उम्मीद बढ़ गई थी जिसे वो इस पूरी फ़िल्म में पूरा करने की कोशिश करती दिखती हैं। एक चुस्त कहानी के बावजूद खराब स्क्रीनप्ले और टूटी कड़ियों के जुड़ने की जद्दोजहद से गुजरती यह फ़िल्म मुझे बायोपिक कम इंस्पिरेशनल मूवी ज़्यादा लगती है। इसीलिए अगर इस फ़िल्म को आप बायोपिक के तौर पर आंक रहे हैं तो मेरी तरह निराश हो सकते हैं।
कुल मिला के कहूँ तो विद्या के शानदार अभिनय और फ़िल्म के जानदार डायलॉग के लिए यह फ़िल्म कम से कम एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए
और इसलिए भी क्योंकि हर औरत के मन में यह सवाल कभी न कभी ज़रूर उठता होगा कि एक आदमी हमेशा एक औरत की ज़रूरत क्यों बनाना चाहता है, वो क्यों चाहता है कि वह उसका संबल बने, एक औरत का प्यार मात्र उसके लिए काफ़ी क्यों नहीं हो पाता...
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