Monday, 10 August 2020

कॉफ़ी मग और फ़िल्म

 मेरे हाथ में कॉफ़ी का  मग है...रात के शायद ढाई बजे हैं…बिजलियों की गड़गड़ाहट बाहर आसमान में ही नहीं मुझे मेरे भीतर भी महसूस हो रही है, कितनी उथल पुथल मची है... जीवन के धागे आपस में कुछ उलझ से गए हैं गजब की बेचैनी सी है, उसने पूछा "क्या तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई और है" क्या कहती कि तुम्हारी तस्वीर तो मुझमें ही रहती है तुम कोई और कैसे हुए पर नाम क्या दूं तुम्हें, समझ ही नहीं पाई...तुम कहाँ नाम देश काल के बंधन में बंधे हो कभी, असीम हो तुम, तुम्हारी सीमाएं कहाँ और क्योंकर हो भला ....

तुम औऱ तुम्हारी यादों को मैं झटक देना चाहती हूँ और इनसे पार पाने के लिए ही मैं फ़िल्म देखना शुरू करती हूँ....


स्क्रीन पर रणवीर सिंह है, उसके बालों से होते हुए बर्फ़ उसके होठों को छू कर गिर रही है...मैं बर्फ की एक मोटी चादर को रणवीर और सोनाक्षी दोनों की आँखों में भी पिघलते हुए महसूस करती हूँ... फ़िल्म खत्म होने में अब कुछ ही वक़्त बचा है...यह फ़िल्म ना कोई सस्पेंस है ना थ्रिलर बल्कि शायद अंत भी मैं जानती हूं पर फ़िर भी अंत देखने का मोह नहीं छूटता, स्क्रीन पर नज़रें एकटक टिकी हैं, तभी पाखी पूछती है "क्या तुमने कभी मुझे प्यार किया था?".. रणबीर कि आँखें देख कर लगता है कि जैसे वरूण अपना दिल निकाल कर सामने रख देना चाहता है पर जैसे सबकुछ समेट कर कहता है "तुम मेरी ज़िन्दगी का वो आखिरी मौका थी जब मैं जी सकता था, मुझे सभी ने इस्तेमाल  किया, पर प्यार सिर्फ़ तुमने किया, मैं तब भी तुमसे बेहद प्यार करता था आज भी करता हूँ"

 ऐसा लगता है जैसे पाखी यानी सोनाक्षी की आँखों में सुकून उतर आया हो ..

 वरुण, पाखी से कहता है "ये ज़िन्दगी जो तुम जी रही हो, तुम्हारी नहीं है क्यों अपनी ज़िन्दगी एक पत्ते से जोड़ रखी है तुमने... पाखी कहती है "डरती हूँ  अगर यह आखिरी पत्ता भी गिर गया तो ? वरुण उसका हाथ कस कर थाम लेता है और कहता है ऐसा कभी नहीं होगा...


मैं जानती हूँ उम्मीद की कीमत क्या होती है, वरुण भी जानता है इसलिए दुनियादारी की कसौटी पर बचकानी सी  लगने वाली पाखी की मांग को वो अपने मरने से पहले पूरा करने में अपनी जान लगा देता है...

 

पाखी की उम्मीद को बचा कर रखने के लिए वरूण की वो बेचैनी मुझे याद दिलाती है ओ हेनरी की लघु कहानी "द लास्ट लीफ़" की... सालों पहले मैंने बच्चों को पढ़ाई है यह कहानी…बाद में इस फ़िल्म के बारे में पढ़ते हुए पता चला कि इस याद का आना स्वाभाविक है क्योंकि फ़िल्म का अंत वाकई इसी कहानी पर आधारित है।


फ़िल्म है 2013 जुलाई में ही रिलीज़ हुई 'लुटेरा'...जिसके कहानीकार और निर्देशक हैं विक्रमादित्य मोटवानी... फ़िल्म शुरू होती है पश्चिम बंगाल के मानिकपुर से और ख़त्म होती है डलहौजी की गलाती गिरती बर्फ़ में ...


सिनेमेटोग्राफी के लिहाज़ से यह एक शानदार फ़िल्म है जिसे अंजाम दिया है फिल्मफेयर समेत तमाम पुरस्कार विजेता महेंद्र शेट्टी ने। शेट्टी वही हैं जिन्होंने 'फैसला' और 'उड़ान' जैसी फिल्में की हैं हालांकि बतौर निर्देशक विक्रमादित्य ने भी 1950 का बंगाल बखूबी उकेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है,  चाहे वो पुरानी हवेलियां हों या विंटेज कारों का इस्तेमाल…निर्देशक की रिसर्च और मेहनत दिखाई देती है।


यूं तो फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई ना ही 100 करोड़ वाले क्लब में ही शामिल हो सकी  पर तकरीबन 27 करोड़ में बनी इस फ़िल्म ने अपनी लागत का दोगुना तो निकाल ही लिया... 


रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा के लिए भी यह फ़िल्म खास है क्योंकि इस फ़िल्म से इन दोनों ने ही अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा लिया..


 जाने क्यों पूरी ही फ़िल्म में रणबीर हीरो से नहीं लगते, महीन पतली सी आवाज़ वाला एक आम किरदार जो अपने प्रेम को पाने के लिए दुनिया से लड़ता नहीं है यानी उसमें कोई एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी हिरोइक क्वालिटी नहीं 

 पर फिर भी जैसे हर घर में कोई सुपरहीरो होता है मेरे पापा मेरे सुपर हीरो टाइप, वो जो अपनी फैमिली के लिए कुछ भी करने को राज़ी होता है, बियॉन्ड लिमिट जाके अपनी सीमाओं को चुनौती देकर...

 जिसे दुनिया भले याद करे ना करे पर वो अपने परिवार अपने चाहने वालों के दिल में धड़कता है

कुछ कुछ वैसा ही है ये किरदार हीरो नहीं सुपर हीरो वो भी पर्सनल वाला… जिस प्रेम को पाने की नाकाम कोशिश कर वो छोड़ चुका है उसी प्रेम के लिए वह ज़िन्दगी की परवाह नहीं करता..

 प्रेम को पाना नहीं…. प्रेम में बस देना, अनवरत दिए जाने वाले इस निर्मोह ने ही इस किरदार का कद बढ़ा दिया है…

अलबत्ता  मुझे, सोनाक्षी इस फ़िल्म के एक बड़े हिस्से में हीरो इमेज लगती हैं। 

फ़िल्म सच कहूँ तो मेरे मन को छूने में नाकामयाब रही, हाँ कुछ दृश्य ज़रूर शानदार हैं..जिनमें से एक सीन मैंने तस्वीरों में भी दिखाया है


किसी भी बॉलीवुड फ़िल्म में गाने बेहद ज़रूरी कॉम्पोनेंट होते हैं इस फ़िल्म के गाने जैसे मेरे इसी बारिश वाले मूड को ध्यान रख कर लिखे बुने गए हों, बाहर बारिश का शोर और भीतर दिल का… और बैकग्राउंड में बजते इसके गीत …आह! इससे ज़्यादा आप क्या ही चाहेंगे...

फ़िल्म का संगीत दिया है अमित त्रिवेदी ने... माफी की गुज़ारिश समेत  त्रिवेदी जी को लेकर मैं इतनी बायस्ड हूँ कि उनपर कुछ ना कहूँ तो ही बेहतर…

उनके लिए मैं बायस्ड क्यों हूँ ये आप इस फ़िल्म के गाने सुन कर समझ जाएंगे… और उसपर मोनाली ठाकुर, मोहित चौहान और स्वानंद किरकिरे बस यूं समझिए कि बारिश की बूंदों से ज़्यादा वाजिब और माकूल वक़्त नहीं हो सकता इन्हें सुनने का तो जाइए आप भी सुनिए और गुनगुनाइए … मैं भी चलती हूँ

आखिर यादें चुभलाना भी काम है साहब, उम्मीदतन इन गानों की गुनगुनाहट अब इसे तनिक आसान कर देगी...


*फोटोज़ गूगल से साभार

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