काली हो, मोटी हो, पतली हो झाड़ू की सींक जैसी हो हथिनी हो, ड्रम हो, रंग दबा है, चेहरे पर दाग हैं, नाक फूली हुई है, चिपटी है, आँखें छोटी है, नेपालियों जैसी है, चिंकियो जैसी है, बाल झड़े हुए हैं, सफ़ेद हैं, झाड़ू हैं, इतनी काली है कि जैसे मनहूसियत..और भी कितना कुछ...
दिल को छलनी करती फब्तियां और उसके बाद ये ऐक्सक्यूज़
-अरे बुरा मान गए क्या मज़ाक था यार इट्स ओक्के ना...
-तुम क्या किसी को कहोगी भैंगी जैसी तो शक्ल है तुम्हारी..
-उसको तो राह चलते कोई छेड़ेगा भी ना (ये सबसे भयानक टिप्पणी सुनी थी मैंने एक महिला के लिए और शर्मिंदा हूँ यह कहते हुए कि कहने वाले लोग प्रबुद्ध वर्ग का हिस्सा थे, पढ़े लिखे थे)
कहाँ कह पाए हम कि बॉस नो, ईट्स नॉट ओक्के, ईट्स नॉट ओक्के ऐट ऑल...
कितना मामूली है ना ये सब , कितना आम, किसने नहीं कहा होगा? शायद हम सब ने कहा है, कभी ना कभी, कहीं ना कहीं...कभी ठहाकों में तो कभी शायद गुस्से में, ईर्ष्या से या शायद ऐसी ही किसी भावना से, तो क्या हम सब अपराधी हैं?
हाँ, यही कड़वा सच है...हम अपराधी हैं...
दिन भर में ना जाने कितनी ही बार हम ऐसी मौखिक हिंसा करते हैं। गाहे ब गाहे एक इंसान को उसकी शारिरिक संरचना के आधार पर तौलते हैं हम...
एक इंसान के तमाम गुण दोष किनारे रख कर उसे जज करने का एक मात्र मापदंड रह जाता है उसका फिज़िकल अपीयरेन्स... वो फिज़िकल अपीयरेंस जिसके अच्छे बुरे होने पर किसी का भी अधिकार ही नहीं है, उसे लेकर किसी को कोसना, जज करना....क्या ये न्याय है?... सोचिए!
औसत लोग इसका शिकार भी होते हैं... हाँ होते हैं और खूब होते हैं, चिंता मत कीजिए मैं कोई दुःख भरी दास्तान सुना के आपको बोर नहीं करूंगी क्योंकि मैं जानती हूँ एक मेरे कहने से क्या ही बदल जाएगा?
आप नहीं हुए शिकार, तो आपको बधाई आप प्रिविलेज्ड हैं...
पर कभी सोचा है कि आपका यूं ही किया गया एक मज़ाक किस तरह किसी की इंडीविजुअलिटी की धज्जियां उड़ा देता है, किस तरह किसी के आत्मविश्वास को तार तार करता है, किस तरह एक इंसान से जीने की इच्छा मात्र छीन लेता है...
पूरी ज़िन्दगी भेदभाव के बोझ के नीचे दबकर जीने वाली आधी जनसंख्या या तो फेयर एंड लवली के पीछे दौड़ती दिखती है या ग्रीन टी के पीछे जीभ लपलपाते हुए।
खूबसूरत होने के इतने तय पैमाने हैं, इतने सारे पैरामीटर्स कि बंदा पैराशूट ले कर हवाई जहाज़ से तो फिर भी कूद ले पर इन पैरामीटर्स के अनुसार सो कॉल्ड खूबसूरत हो सके, असंभव है...
ब्यूटी होल्ड्स इन द आईज़ ऑफ बीहोल्डर ये सब हमने पढ़ा और फिर भूल गए..
और इन सबके बीच सबसे बड़ी विडंबना तब होती है जब किसी भेदभाव के खिलाफ वो लोग खड़े दिखते हैं जो पूरी ज़िन्दगी इस मौखिक हिंसा का हिस्सा रहे हैं..
फिर एक घटना घटती है, किसी बड़े से देश के छोटे से कोने में और सबकी सोई इंसानियत जाग जाती है...
अजीब हिप्पोक्रेट्स हैं हम…..आला दर्जे के..
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