हमने खुशियों के भी रेज़्यूमे बना रखे हैं मतलब एलिजिबिलिटी क्लौजेज़... ऐसा हुआ तब खुश होऊंगा वैसा हुआ तो बहुत खुश होऊंगा वरना गुप्पा बन के बैठा रहूंगा, नौकरी मिल गई तो खुशियों की चाभी हाथ लग गई, खुदा ना खास्ता चली गई तो जैसे ज़िन्दगी ही चली गई... प्रोफेशनल पर्सनल हर जगह हमारे नियम कानून बंधन... मुझे तो लिखते हुए भी घुटन महसूस हो रही...हमने नियमों के तौर पर मकड़ी के जाले बुने हैं और खुद ही उसमें फंस के रह गए हैं...
कभी कभी सोचती हूँ कि खुद को आज़ाद कर देना इतना मुश्किल कैसे है? दुःखी हो परेशान हो तो कोई प्यारा सा गाना गुनगुना लो, तेज आवाज़ में अपना पसंदीदा डांस नंबर लगा के पसीना आने तक नाच लो, किसी बच्चे से बात कर लो, कोई प्यारी सी फ़िल्म देख लो या किसी बेहद पुराने दोस्त से बात कर लो और ये सब कुछ भी समझ ना आये तो ये अदरक वाली चाय या एक मग कॉफ़ी है ना ..... यकीन मानो बस यही इतना ही चाहिए था ज़िन्दगी से... मुठ्ठी भर सुकून...
अक्सर देखती हूँ लोग सक्सेस स्टोरी बताते हैं या असफलता का अफ़सोस जताते हैं पर मुझे लगता है सबसे ज़रूरी है यात्रा.... एक ऐसी यात्रा जिसमें सब है गिरना उठना टूटना फूटना बिखरना रोना थकना बल्कि सब कुछ....सफलता असफलता भविष्य के गर्भ में है तो उसे वहीं छोड़ देना चाहिए...
मैं इम्प्रैक्टिकल या अव्यवहारिक लग रही? हो सकता है, हाँ ठीक है मानती हूँ मुश्किलें हैं और तमाम हैं पर जीवन को कोसने या ख़त्म करने से मसले नहीं सुलझ सकते ना...जीवन को ख़त्म कर देना समाधान कैसे है, मैं यह आज तक नहीं जानती हूँ ... हर किसी को अपनी समस्या बड़ी लगती है मुझे भी लगती है जब वो मुंह बाए मेरे आगे खड़ी होती है, पर जानती हूँ करने से होता है नहीं करने से अपने आप कुछ भी नहीं होना है..हर मुश्किल अपने हिस्से की कोशिश डिज़र्व करती है...
हाँ निराशा सब ख़त्म कर सकती है तो कुछ दोस्त कुछ ऐसे अपने हमेशा पास होने चाहिए...जो बेशर्त कहें डरो मत , मैं हूँ ना सब ठीक हो जाएगा... तुम खुद कर लोगे सब कुछ... और खुद को बताते चलना भी ज़रूरी कि सब ठीक हो जाएगा... ऑल इज़ वैल...
सारे टंटे ही जीवन के हैं, ज़िन्दगी ही ना हो फिर क्या ही दुःख...
मौत के बाद का दिन किसने देखा है???
तो ज़िन्दगी जीते रहनी चाहिए क्या पता कल क्या हो...तो बेशर्त ख़ुश होना चाहिए, मुस्कान ढूंढनी चाहिए...
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