ताकि साँस ली जा सके/कविता
किसी संभावना का
किसी प्रिय संबंध का
टूटना दरकना
कहाँ होता है
अनायास
ये तो प्रक्रिया है
सतत चलती हुई
और एक दिन
सब बिखर जाता है
मेरी तरह तुम्हारी तरह
टुकड़े टुकड़े हो जाती है ज़िन्दगी
शिकायत के लिए
या कि प्रार्थना के लिए
तब नहीं जुड़ पाते हाथ
कि सब कुछ
बिखर जाने के ठीक पहले
समेट लिया जाना चाहिए
बचा ले जाने की
वो आखिरी कोशिश
कर लेनी चाहिए
कि जिसे संजोया था
सदियों तक
जान लेना चाहिए
कि संजोया नहीं था
ढोया था,यही सच है
सुनो!टूटे टुकड़े समेट कर
एक पोटली में बाँध देना चाहिए
उसी पोटली में धर देना चाहिए
यादों के खोटे सिक्के
कर आना चाहिए प्रवाहित
बहती धारा में
और हो जाना चाहिए आज़ाद
अपनी ही बेड़ियों से...
कि ताकि साँस ली जा सके...
No comments:
Post a Comment