वो दो जोड़ी बड़ी बड़ी पनीली आँखें जिनमें मुद्दतों की नमी भरी हुई सी लगती है.. उस छोटी सी खिड़की के बाहर दूर तक जाती कच्ची पक्की सड़क को घंटों निहारती रहती हैं, जैसे ये उनका पसंदीदा शग़ल हो ...
गोल चेहरे और रंगे हुए भूरे बालों वाली लड़की कि हर वक़्त डबडबाई सी वो आँखें ही तो थीं जो उसे भीड़ से अलग करती थीं...
और बस उन्हीं आँखों ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा था, खुद में ही खोई रहने वाली मैं उसकी तरफ़ बरबस ही खिंचती चली गई, अक्सर देखती हूँ अपने आगे से छोटे कटे हुए बालों को वो बार बार अपने कान के पीछे खोंसने कि नाकामयाब कोशिश करती है और माथे पर गिरते अपने ही लटों से खीजते हुए उन्हें अंदर की तरफ मोड़ कर लम्बे बालों के साथ बाँध देती है....
उसकी खीज ऐसा करते हुए उसकी आँखों में उतर आती है जैसे किसी बेहद तल्लीनता से किए जा रहे काम को करने में व्यवधान डाल दिया गया हो
बाधाओं को पार कर लड़की फिर से सड़क निहारने लगती है...
मुझे पुख्ता तौर पर तो नहीं पता पर लगता है जैसे उसे इंतज़ार है किसी का... जिसे वो बहुत मन लगा कर करती है, हर बार गेट के खुलने कि आवाज़ या किसी भी तरह के खटके से वो चौंक जाती है और उसकी पुरकशिश आँखें किसी को तलाशने लगती हैं ...
उसे देखते हुए कई बार सोचती हूँ कि किसी का इंतज़ार करना कितना मुश्किल उदासी और सब्र भरा काम है...नीरस उबाऊ और अनवरत... कैसी कसक कैसी हूक सी उठती होगी ना दिल में जब आप एक बार मिलने या झलक पाने की उम्मीद में लगातार किसी की राह देख रहे हों... सबकुछ उस आने वाले कि मर्ज़ी से होना है और इस अंतहीन इंतज़ार के ख़त्म होने की उम्मीद भी उसी शख़्स की कायल है... ये सोच मुझे भी घुटन से भर देती है...क्योंकि कुछ ना कर पाने की टीस से बुरा कुछ नहीं हो सकता...
बस इतना कि अगर वाकई इस कायनात को चलाने वाली कोई ताकत मौजूद है तो ऐसा कोई भी अंतहीन इंतज़ार किसी की दुश्वारी न बनने की दुआ माँगती हूँ...आमीन...
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