और धीरे धीरे तुमने अपनी ही बनाई तस्वीर अपने ही हाथों से मिटा दी,
डबडबाई आँखों से वो तुम्हें ताकती रही और तुम बर्बरता से हर रंग मिटाते गए, खुरचते रहे...
जानते हो उसकी बड़ी बड़ी पनीली आँखें अब भी अपनी गलतियों का हिसाब माँगती हैं...उसकी घुटी हुई चीख का दम घोंटता शोर तुम सुन सकते हो न...
पर क्या ग़लती सच में उसकी थी? या तुम्हीं ने रचा था चक्रव्यूह जिसमें वह छटपटा के रह गई?
सच कहना, क्या वाकई तुममें है इतनी कूवत कि तुम उसके किसी सवाल का सामना कर सको, वो हौसला कहाँ से लाओगे कि उसकी झुकी नज़रों के आगे तन के खड़े हो सको...ज़ुबान लड़खड़ा नहीं जाएगी तुम्हारी ...
शायद इसलिए तुम चुप हो जाते हो,है न...
अफ़सोस सिर्फ़ इतना है कि तुम्हारे साथ तुम्हारी ही चुप्पियों का लबादा उस पगली लड़की ने भी ओढ़ लिया है...वो किसी से कुछ नहीं कहती बस घुटती रहती है, घुलती रहती है...
उसकी चुप्पी तुम्हें भी पिघला देगी, तार तार कर बिखेर देगी..सब जानते हो तुम...
हाँ अब तुम जानते हो चुप्पियों की चुभन सबसे ज़्यादा मारक होती है...सबसे ज़्यादा...
और मैं, मैं बनूँगी इन सबकी गवाह , आप भी....हम सब बनेंगे...महज़ मूकदर्शक... बेहद कमज़ोर और टूटे फूटे लोग हैं हम, है न???
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