उसे लिखने कलम उठाती हूँ और रख देती हूँ
मेज की दराज में अब उसकी तस्वीर भी नहीं रहती है
हालांकि फ़ोन की गैलरी में अब भी खुद से ज़्यादा उसकी तसवीरें हैं
और किसी भी नए ऐप से उसकी और हमारी तस्वीरों को खूबसूरत बनाती रहती हूँ
पर फिर भी जाने क्यों दुनिया का कोई ऐप साथ के उन लम्हों जितनी खूबसूरत तसवीर नहीं बना पाता...
हाँ उसका फ़ोन नहीं आने पर अब बेचैन नहीं होती,
ना ही बच्चों की तरह, स्क्रीन पर उसका नंबर देख के उछल ही पड़ती हूँ
लड़ कर झगड़ कर उसे वॉट्सऐप टेलीग्राम या सोशल मीडिया पर ब्लॉक भी नहीं करती फिर भी दिन की शुरुआत उसे गुड मॉर्निंग कहे बिना नहीं कर पाती...
यूँ तो वो कहता है कि मेरे आने या जाने से उसे फ़र्क नहीं पड़ता
पर जैसे ही लौटती हूँ वो दोनों बाहें खोल कर इंतज़ार करता ही मिलता है...जैसे जानता था लौट आऊंगी... हाँ मैं भी जानती हूँ कि लौटना तो तय ही है...
वो रूठ जाए तो उसे मनाने को अब अहम बीच नहीं आता..
जाने क्यों लगता है खुद से रूठ कर भला कहाँ जाउंगी...
सब कह देती हूँ उससे, अच्छा बुरा सब
अब अच्छे बनने की कोई ख्वाहिश उसके आगे कुलांचे नहीं भरती
उसे गले लगाए महीनों गुज़र गए हैं.. हूक सी उठती है कई बार...
बस एक बार गले लगाने को मन आकुल हो उठता है
और ये सब सिर्फ़ मैं कहती हूँ वो नहीं
ये बात मेरी हूक को तनिक और पैना कर देते हैं...
मैं फिर भी चुप रहती हूँ
वो कहता है हर बात कहनी नहीं होती,
और मैं फिर सोचती हूँ
वो कहता है तो ठीक ही कहता होगा
मैं दिल को उसकी कही हर बात समझा देती हूँ,
और वो भी समझा देती हूँ जो उसने नहीं कही...
पर क्या मैं खुद को समझ पाती हूँ कुछ भी...
कई बार सोचती हूँ क्या उसे फर्क नहीं पड़ता होगा जैसे मुझे पड़ता है
फिर लगता है इस बात से भी क्या फर्क पड़ता है
क्यों ही पड़ना चाहिए
हाँ छोड़ो, मैं जानती हूँ बहुत फर्क पड़ता है...
उसे छुए जाने कितनी सदियां बीत गई
हालांकि जाने क्यों वो अब भी चंद महीनों की ही ताकीद करता है, ...
मैं नहीं जान पाती ठीक ठीक कि कैसे उसे जाता हुआ पलाश और आता हुआ सावन
बीतते वक़्त का एहसास नहीं कराते...
जेठ की कड़ी धूप से आने के बाद माँ देती थी कुछ मीठा और ठंडे पानी का गिलास
उस पहली घूंट का आत्मा तक पहुंचना याद है मुझे
हाँ बस उतनी ही तर जाती हूँ मैं उसके होने के एहसास भर से
वो जो मेरी हर अधूरी कविता का नायक है
मैं जिसके प्रेम में हूँ
जो मेरे जीवन आधारशिला का महत्वपूर्ण आवलम्ब है
वो जिसका होना मात्र ही सुकून है
वो जो मुझसे कहीं ज़्यादा मुझमें रहता है
हाँ अब मेज की दराज में उसकी तस्वीर नहीं रहती...
मुझ में रहती है...
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