Monday, 10 August 2020

बचपन वाला बुद्धु बक्सा

 छोटी थी तब, तक़रीबन 7-8 साल की, मोगली की ज़बरदस्त फैन थी, वही जंगल बुक वाला, इतनी की उसी के जैसे हरकतें भी थी उछलना कूदना लटकना मटकना सब..फिर एक दिन टीवी खराब हो गया और मेरी बचपन वाली दुनिया जैसे उजड़ ही गई...

पर मैं आपदा में अवसर तब भी ढूंढ लेती थी तो फॉर्मूला ऐसे सेट हुआ कि बगल में एक आंटी रहती  थीं, मुझे खूब प्यार करती थीं प्यार तो मैं भी करती थी पर मेरा प्यार उनके लिए कुछ कम और उनके टीवी के लिए ज़रा ज़्यादा था...तो हर संडे मैं उनके घर पहुंच जाती थी जंगल बुक देखने सिलसिला ठीक ठाक चल रहा था पर कब तक..

क्योंकि घर में थे बाबा यानि दादाजी,उनके साथ इक्वेशन ऐसा था कि एक दूसरे के बिना तब हमारा गुजारा नहीं हो पाता था, तो हर रविवार को मेरा घंटे दो घंटे गायब होना वो ऑब्ज़र्व कर रहे थे, दो तीन संडे तो कुछ नहीं बोला गया पर चौथे सण्डे भी जब मैं घर में न मिली तो लौटते ही कचहरी लगी, मुझे सम्मन हुआ और जब सम्मन हुआ तो पेशी भी हुई सवाल था कि हर रविवार गायब क्यों हो जाती हो, दूसरे के घर इतनी देर क्यों रहती हो, भूख प्यास नहीं लगती, वहीं क्यों खा लेती हो, अपने घर का खाना अच्छा नहीं लगता क्या?

अपने घर से ज़्यादा अच्छा तो आज भी किसी के घर का खाना नहीं लगता था, और 8 साल के बच्चे को कितनी भूख लगती है जानते ही हैं आप लोग पर जंगल बुक जो न कराए...खैर डरते सहमते बता दिया कि भई जंगल बुक देखने जाते हैं और फिर कीमत में आंटी के साथ खेलने बतियाने में बाकी वक़्त चला जाता है... बाबा बहुत खुश तो नहीं दिखे पर बिना किसी फैसले के उस दिन कचहरी की कार्रवाई वहीं स्थगित हो गई... अब चूंकि फैसला तो मिला नहीं था और पूछने की भी हिम्मत नहीं थी कि आंटी के घर जा सकते हैं या नहीं, पूरा हफ़्ता इसी ऊहापोह में निकला कि इस संडे मोगली देख सकेंगे या नहीं देख सकेंगे...

संडे आना था आया और फिर हुआ चमत्कार वो आंटी खुद बुलाने आ गईं कि आज तुम आई नहीं, दाएं बाएं देखा तो पता चला बाबा घर में नहीं हैं फिर क्या अप्पन तो खुश हो गए

घर के लोग भी मुरव्वत में आंटी को न नहीं कह पाए और मैं उछलती कूदती चल निकली मोगली से मिलने..

पर मेरी खुशियों पर काली माता वाला श्राप हो जैसे...

 ऐपिसोड अभी शुरू हुआ ही था कि बाबा की आवाज़ कानों में पड़ी 

इधर  वो टाईटल सॉन्ग बज रहा था जो अब भी ज़ुबानी याद है, वही चड्ढी पहन के फूल खिला है वाला... और उधर बाबा की पुकार...समझ ही नहीं आया कि फ़ोकस कहां करें लेकिन ये तो पता ही था कि बाबा कि आवाज़ को इग्नोर नहीं किया जा सकता है...

भारी मन से चड्ढी पे फूल खिलता छोड़ कर बाबा के पास पहुंची तो उन्होंने बेहद सख़्त आवाज़ में कहा चलो अंदर जाओ...

मन ही मन बाबा के जल्दी आने को कोसते हुए अंदर पहुंची तो चीख ही निकल पड़ी..

खुशी के मारे... घर में टीवी रखा था और अब अपने घर में बैठ कर टीवी देख सकती थी...मैं खुशी से नाच रही थी और बाबा मुस्कुरा रहे थे मोगली को उस छोटे से टीवी स्क्रीन पर देखा और बाबा के गालों पर थैंक्यू वाली पप्पी दी, वो टीवी ग्रैजुएशन तक सिर्फ़ मेरा रहा...मेरे कमरे में..

वो खुशी सालों बाद 4D वाले बड़े स्क्रीन के मोगली को देखकर जाने क्यों महसूस नहीं कर पाई हालांकि मोगली भी वही था और मैं भी पर कुछ था जो बिना कुछ कहे समय के साथ बदल गया था...

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