बनारस, काशी , वाराणसी
हाँ ये मेरा शहर है वो शहर जहाँ मेरी आत्मा रहती है ...
सीधे सीधे कहूँ तो हम लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में हैं... मैं शहर में रहूँ ना रहूँ यह शहर मेरे भीतर हमेशा धड़कता है..
हाँ बीच बीच में मैं कई शहरों से गुज़रती हूँ पर मजाल है यह शहर एक पल को मेरा हाथ छोड़े... कहते हैं आप किसी शहर में तब तक नहीं जा पाते जब तक वो शहर आपको ना बुलाए और आज छः साल हुए भेंट को... पर जाने क्यों रूठ सा गया है...जानती हूं बुलाएगा और जब बुलाएगा तो मान मनुहार कर मना ही लूंगी..
आह! 'बनारस' जब कहती हूँ तो एक अलग ही तृप्ति से तर होती हूँ, जेठ की दोपहरी में कभी सुराही का ठंडा मीठा पानी पिया है आपने हाँ बिल्कुल वैसा ही शीतल, आत्मा तक अपनी उंगलियों से अपना नाम लिखता हुआ सा...
हाँ जानती हूँ ये शहर मरघटों का शहर है, मृत्युस्थली है, मरने आते हैं लोग यहाँ, फिर भी डराता नहीं अपने सम्मोहन से खींचता है...
मेरे घर के ठीक बगल में मुमुक्षु भवन है, वही जगह जहाँ लोग मौत का इंतज़ार करने आते हैं... और यकीन मानिए बनारस किसी को निराश नहीं करता इसके पास सबके लिए दो गज ज़मीन और चंद लकड़ियो का जुगाड़ है...
आडंबरों से कोसों दूर औघड़ों का शहर, जीवन से परे मृत्यु से मोह का शहर, हर मोह को साध चुका, ज्ञान के निर्वाण का शहर, वो शहर जहां बुद्ध ठौर पा लेते हैं, वो शहर जो शिव के त्रिशूल पर बिना डिगे विद्यमान रहता है...
इसके अपने ही फलसफे हैं अलग ही ज़िन्दगी अलग नियम कायदे यहाँ का हर बाशिंदा आपको कुछ ना कुछ सिखा के जाता है और बस इसलिए यहाँ हर कोई गुरू है...छोटा मोटा काला गोरा हर कोई, बिना भेद के, क्योंकि मेरा ये शहर भेद नहीं करता न गलियों का ना गालियों का, मिजाज़ की मुफलिसी कि हद तो देखिए इसकी गालियाँ आपको औरत मर्द का भेद नहीं देंगी, सब बराबर है यहाँ क्या राजा क्या रंक...
अब गालियों की हुई तो गलियों की भी हो जाए...
तंग गलियों में बंटा और अंटा हुआ यह शहर आपको सिखाता है कि जीवन की गलियां चाहे कितनी ही गूढ़ हो राह खोजो तो निकल ही जाओगे, यह शहर आपको ज़िन्दगी भर वापसी की उम्मीद देता रहता है, कि कभी गलती से अगर किसी बंद गली में घुस गए तो घबराना मत क्योंकि समझो गुरू, ये बनारस है तुम्हारा चांदनी चौक नहीं कि घुस जाओ तो राह नहीं मिलेगी, बस ज़रा मन से चार कदम पीछे जाना और देखना... वहीं हाँ ठीक वहीं एक और गली होगी...ज़िन्दगी और तुम्हें... तुम दोनों को मंज़िल का रास्ता दिखाती हुई...
मेरे इस शहर में घाट हैं और घाट घाट का पानी भी... हर रोज़ कुछ नया दिखाता यह शहर सुबह चार बजे से चौकन्ना हो जाता है, यह शहर निहायत ही शरीर भी है ज़रा सी सावधानी हटी तो आपको ठग लेगा और ठहाकों के साथ अपने ठग होने का ऐलान करेगा,बनारसी ठग तो सुने ही होंगे ना आपने...
फक्कड़ है पर कंजड़ नहीं है प्रेम खुले हाथ खरचता है ये और यकीन मानिए मेहमान नवाजी भी खूब करता है
यह जो खुद खाएगा आपको भी देगा और क्या ही ज़बरदस्त स्वागत करेगा
पान से आपका इस्तक़बाल करेगा और दशाश्वमेध के घाट पर कुल्हड़ वाली चाय परोसेगा, बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके अघा जाइएगा तो गोदौलिया के गोलगप्पे और चाट के चटखारों तक पहुंचायेगा, मिर्च और इमली के पानी के प्रभाव से माथे पे स्वेग की जो बूंदें उभरेंगी ना उन्हें चौक की ठंडाई से ठंडक देगा, हाथ पकड़ का नई सड़क पर हल्के मीठे मलइयो के स्वाद से स्वर्ग धरती पर ले आएगा और लंका के चौराहे पर मोटी मलाई वाली लस्सी से नवाज़ कर जीवन में ही स्वर्ग का सुख भी देगा,
खत्म नहीं हुआ अभी, चलिए चला जाए, तो कदम तनिक तेज़ बढ़ाइए, क्या हुआ? थक गए? अरे तनिक हिम्मत और कीजिए बस ज़रा ही दूर कचौड़ी गली है तो यह शहर आपको वहाँ जलेबी दही का भोग लगवाएगा इमरती और कचौड़ी का विकल्प भी खुला है ठीक ठीक लगा लीजिएगा पेट व जिह्वानुसार... और तनिक और आगे बढ़ कर सीता के समोसों से आपको तृप्त कर देगा...आहम आह आहा !
अस्सी के घाट पर चिलम गांजे के धुएं में मदमस्त मिलेगा आपको यह तो बीएचयू से कमच्छा तक ज्ञान के गोते भी लगवाएगा, कमच्छा पर एनी बेसेंट वाली सोसायटी है बताती चलूँ एनी बेसेंट अकेली एंग्लो इंडियन थीं जो संविधान सभा का हिस्सा बनीं..
क्या हुआ क्या लगा पढ़ लिए हो गए पंडित? अबे छोड़िए मर्दवा, बीएचयू के मधुबन प्रेम मिलन चौराहे और न्यू वीटी के चक्कर काटे बिना काहे के पंडित भए...
इसके बाद तनिक राजघाट चलिए बीएचयू के ठीक बाहर उलटी तरफ़ ऑटो स्टैंड से लीजिए ऑटो और चल निकलिए, यह बनारस का वो कोना जो अलग ही दुनिया है, बनारस को तनिक और बनारस बनाता हुआ और फिर दूसरी ओर उलटी तरफ ज़रा गिलट बाज़ार से होकर यूपी कॉलेज की तरफ भी मुड़िए ज्ञान ही ज्ञान है यहाँ कितना बटोरिएगा बताइए
क्या हुआ? हो गया? अरे अभी कहाँ महाराज तनिक और जी लगाइए अभी तो काशी विद्यापीठ से लेकर भारत माता का इकलौता मंदिर शेष है तो चलिए उसके भी चक्कर काट लें...
फिर सिगरा पर ip मॉल के ठीक सामने अनामिका में फालूदा भी तो खाना है, ज़रा कान इधर लाइए, कुछ कहूँ पर कहिएगा नहीं किसी से तो सुनिए फालूदा खाते समय मेरे पहले प्यार को महसूस कीजिएगा बड़ा गहरा नाता है इस जगह से... हाँ हाँ ये शहर सब जानता है इससे क्या छिपाना सबकुछ तो पता है इसे मेरा राज़दार जो है ये और अब आप भी...
मेरा शहर पज़ेसिव नहीं है फिर भी हक़ जताना जानता है, गुड्डी पतंग उड़ाते इस शहर को खूब पता है कि ढील कहाँ देनी है और मांझा खींचना कहाँ है इसलिए तो कहती हूं कि जो इसके प्रेम में पड़ा समझो फकीर हुआ तन से बिल्कुल फक्कड़ और मन से शंकर ... यानि शिव यानि असीम अगाध विशाल...जीवन कहीं भी जियो मौत के बाद मोक्ष और निर्वाण देकर अपने में समेट लेने वाला शहर तो यही है
अभी डीएलडब्लू और दालमंडी शेष ही है अच्छा ध्यान रखें वहाँ जाएं तो लौंगलता से लेकर बंगाल स्वीट के रसगुल्ले का भोग ज़रूर लगाएं...वरना उतनी दूर जाना निरर्थक हो जाएगा...
थक कर सुकून की चाह है तो शाम को रीवा घाट चलिएगा वहाँ से नाव में बैठ कर साँझ की आरती देखने दशाश्वमेध चल निकलेंगे, सुकून की कोई ठौर होगी तो बस यही होगी...यकीन जानिए गंगा को गंगा के बीचों बीच से निहारने से ज़्यादा सम्मोहन तो इंद्र की किसी अप्सरा में भी क्या होगा... शंखनाद और असंख्य घंटियों के कोलाहल में टिमटिमाते दीयों के बीच शांति का वह टापू मन की तमाम झंझावतों को शांत कर देता है...
जानते हैं मेरी एक बुरी आदत है मैं सामने से जाकर हाथ नहीं थामती और थाम ही लूँ तो निभा पाना तब तक मुश्किल होता है जब तक सामने वाले से मन कायदे से ना मिले, मेरा शहर ये बखूबी जानता था, इसलिए खुद आया मुझे अंकवार करने, मुझे डोली भी इसी ने बिठाया विदा भी इसी ने किया और पहुंची भी इसी तक , जानती हूँ जब थक कर हार कर खर्च हो जाउंगी तो मेरे भीतर की रेज़गारी को समेटेगा भी यह शहर ही
इंतज़ार है, देखें कब बुलाता है यह, सालों बीते गले लगे... अच्छा आप भी चलिएगा क्या? हमारी प्रिवेसी की फिक्र ज़रा ना कीजिएगा हम भीड़ में भी जीते हैं एक दूसरे को, वैसे भी यह शहर हर रोज़ की मौतों के बीच भी जीना जानता है तो फिर प्रिवेसी कौन बड़ी बात...
फिर यही तो प्रेम है..
मुझसे पूछिएगा कि कब पता चला मुझे मेरे इस इश्क़ का तो ठीक ठीक बता नहीं पाउंगी क्योंकि ये धीरे धीरे उपजा प्रेम है जिसका रंग समय की आँच पर मद्धिम मद्धिम गाढ़ा होता है... ये इश्क़ हमेशा से तो नहीं था, इस शहर ने यह कमाया है... मेरे भीतर यह शहर पनपता है बिल्कुल मंथर गति से... इस शहर ने मुझे समझा है बनाया है और वक़्त बेवक़्त संभाला भी है, इसकी ईमानदारी और खरापन मेरी पूंजी है, बनारस जो महज़ शहर नहीं मेरा साथी है प्रेम है, मोह है और मोक्ष भी...मैं इसके इश्क़ में मुब्तिला हूँ गिरफ्तार हूँ ...हाँ आज़ादी की हद तक...
*तस्वीरें गूगल से साभार