Monday, 10 August 2020

मुझ में रहती हैं

 उसे लिखने कलम उठाती हूँ और रख देती हूँ

मेज की दराज में अब उसकी तस्वीर भी नहीं रहती है

हालांकि फ़ोन की गैलरी में अब भी खुद से ज़्यादा उसकी तसवीरें हैं

और किसी भी नए ऐप से उसकी और हमारी तस्वीरों को खूबसूरत बनाती रहती हूँ

पर फिर भी जाने क्यों दुनिया का कोई ऐप साथ के उन लम्हों जितनी खूबसूरत तसवीर नहीं बना पाता...


हाँ उसका फ़ोन नहीं आने पर अब बेचैन नहीं होती, 

ना ही बच्चों की तरह, स्क्रीन पर उसका नंबर देख के उछल ही पड़ती हूँ 

लड़ कर झगड़ कर उसे वॉट्सऐप टेलीग्राम या सोशल मीडिया पर ब्लॉक भी नहीं करती फिर भी दिन की शुरुआत उसे गुड मॉर्निंग कहे बिना नहीं कर पाती...


यूँ तो वो कहता है कि मेरे आने या जाने से उसे फ़र्क नहीं पड़ता 

पर जैसे ही लौटती हूँ वो दोनों बाहें खोल कर इंतज़ार करता ही मिलता है...जैसे जानता था लौट आऊंगी...  हाँ मैं भी जानती हूँ कि  लौटना तो तय ही है...


वो रूठ जाए तो उसे मनाने को अब अहम बीच नहीं आता..

जाने क्यों लगता है खुद से रूठ कर भला कहाँ जाउंगी...

सब कह देती हूँ उससे, अच्छा बुरा सब

अब अच्छे बनने की कोई ख्वाहिश उसके आगे कुलांचे नहीं भरती


उसे गले लगाए महीनों गुज़र गए हैं.. हूक सी उठती है कई बार...

बस एक बार गले लगाने को मन आकुल हो उठता है 

और ये सब सिर्फ़ मैं कहती हूँ वो नहीं

ये बात मेरी हूक को तनिक और पैना कर देते हैं...

मैं फिर भी चुप रहती हूँ

वो कहता है हर बात कहनी नहीं होती, 

और मैं फिर सोचती हूँ 

वो कहता है तो ठीक ही कहता होगा 

मैं दिल को उसकी कही हर बात समझा देती हूँ, 

और वो भी समझा देती हूँ जो उसने नहीं कही...

पर क्या मैं खुद को समझ पाती हूँ कुछ भी...


कई बार सोचती हूँ क्या उसे फर्क नहीं पड़ता होगा जैसे मुझे पड़ता है

फिर लगता है इस बात से भी क्या फर्क पड़ता है 

क्यों ही पड़ना चाहिए

हाँ छोड़ो, मैं जानती हूँ बहुत फर्क पड़ता है...


उसे छुए जाने कितनी सदियां बीत गई 

हालांकि जाने क्यों वो अब भी चंद महीनों की ही ताकीद करता है, ...

मैं नहीं जान पाती ठीक ठीक कि कैसे उसे जाता हुआ पलाश और आता हुआ सावन 

बीतते वक़्त का एहसास नहीं कराते...


जेठ की कड़ी  धूप से आने के बाद माँ देती थी कुछ मीठा और ठंडे पानी का गिलास

उस पहली घूंट का आत्मा तक पहुंचना याद है मुझे

हाँ बस उतनी ही तर जाती हूँ मैं उसके होने के एहसास भर से  

वो जो मेरी हर अधूरी कविता का नायक है 

मैं जिसके प्रेम में हूँ

 जो मेरे जीवन आधारशिला का महत्वपूर्ण आवलम्ब है 

वो जिसका होना मात्र ही सुकून है 

वो जो मुझसे कहीं ज़्यादा मुझमें रहता है 

हाँ अब मेज की दराज में उसकी तस्वीर नहीं रहती...


मुझ में रहती  है...

बचपन वाला बुद्धु बक्सा

 छोटी थी तब, तक़रीबन 7-8 साल की, मोगली की ज़बरदस्त फैन थी, वही जंगल बुक वाला, इतनी की उसी के जैसे हरकतें भी थी उछलना कूदना लटकना मटकना सब..फिर एक दिन टीवी खराब हो गया और मेरी बचपन वाली दुनिया जैसे उजड़ ही गई...

पर मैं आपदा में अवसर तब भी ढूंढ लेती थी तो फॉर्मूला ऐसे सेट हुआ कि बगल में एक आंटी रहती  थीं, मुझे खूब प्यार करती थीं प्यार तो मैं भी करती थी पर मेरा प्यार उनके लिए कुछ कम और उनके टीवी के लिए ज़रा ज़्यादा था...तो हर संडे मैं उनके घर पहुंच जाती थी जंगल बुक देखने सिलसिला ठीक ठाक चल रहा था पर कब तक..

क्योंकि घर में थे बाबा यानि दादाजी,उनके साथ इक्वेशन ऐसा था कि एक दूसरे के बिना तब हमारा गुजारा नहीं हो पाता था, तो हर रविवार को मेरा घंटे दो घंटे गायब होना वो ऑब्ज़र्व कर रहे थे, दो तीन संडे तो कुछ नहीं बोला गया पर चौथे सण्डे भी जब मैं घर में न मिली तो लौटते ही कचहरी लगी, मुझे सम्मन हुआ और जब सम्मन हुआ तो पेशी भी हुई सवाल था कि हर रविवार गायब क्यों हो जाती हो, दूसरे के घर इतनी देर क्यों रहती हो, भूख प्यास नहीं लगती, वहीं क्यों खा लेती हो, अपने घर का खाना अच्छा नहीं लगता क्या?

अपने घर से ज़्यादा अच्छा तो आज भी किसी के घर का खाना नहीं लगता था, और 8 साल के बच्चे को कितनी भूख लगती है जानते ही हैं आप लोग पर जंगल बुक जो न कराए...खैर डरते सहमते बता दिया कि भई जंगल बुक देखने जाते हैं और फिर कीमत में आंटी के साथ खेलने बतियाने में बाकी वक़्त चला जाता है... बाबा बहुत खुश तो नहीं दिखे पर बिना किसी फैसले के उस दिन कचहरी की कार्रवाई वहीं स्थगित हो गई... अब चूंकि फैसला तो मिला नहीं था और पूछने की भी हिम्मत नहीं थी कि आंटी के घर जा सकते हैं या नहीं, पूरा हफ़्ता इसी ऊहापोह में निकला कि इस संडे मोगली देख सकेंगे या नहीं देख सकेंगे...

संडे आना था आया और फिर हुआ चमत्कार वो आंटी खुद बुलाने आ गईं कि आज तुम आई नहीं, दाएं बाएं देखा तो पता चला बाबा घर में नहीं हैं फिर क्या अप्पन तो खुश हो गए

घर के लोग भी मुरव्वत में आंटी को न नहीं कह पाए और मैं उछलती कूदती चल निकली मोगली से मिलने..

पर मेरी खुशियों पर काली माता वाला श्राप हो जैसे...

 ऐपिसोड अभी शुरू हुआ ही था कि बाबा की आवाज़ कानों में पड़ी 

इधर  वो टाईटल सॉन्ग बज रहा था जो अब भी ज़ुबानी याद है, वही चड्ढी पहन के फूल खिला है वाला... और उधर बाबा की पुकार...समझ ही नहीं आया कि फ़ोकस कहां करें लेकिन ये तो पता ही था कि बाबा कि आवाज़ को इग्नोर नहीं किया जा सकता है...

भारी मन से चड्ढी पे फूल खिलता छोड़ कर बाबा के पास पहुंची तो उन्होंने बेहद सख़्त आवाज़ में कहा चलो अंदर जाओ...

मन ही मन बाबा के जल्दी आने को कोसते हुए अंदर पहुंची तो चीख ही निकल पड़ी..

खुशी के मारे... घर में टीवी रखा था और अब अपने घर में बैठ कर टीवी देख सकती थी...मैं खुशी से नाच रही थी और बाबा मुस्कुरा रहे थे मोगली को उस छोटे से टीवी स्क्रीन पर देखा और बाबा के गालों पर थैंक्यू वाली पप्पी दी, वो टीवी ग्रैजुएशन तक सिर्फ़ मेरा रहा...मेरे कमरे में..

वो खुशी सालों बाद 4D वाले बड़े स्क्रीन के मोगली को देखकर जाने क्यों महसूस नहीं कर पाई हालांकि मोगली भी वही था और मैं भी पर कुछ था जो बिना कुछ कहे समय के साथ बदल गया था...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियां, लाल बुज्झकड़, छुट्टी छुट्टी, सुनो कहानी,मालगुड़ी डेज़, जंगल बुक, चंद्रकांता, ब्योमकेश बख्शी...  शुक्रवार वाली हिंदी फीचर फिल्म जो दो भाग में दिखाई जाती थी फिर  शनिवार की दोपहर किसी राज्य की प्रादेशिक भाषा वाली फ़िल्म जो सबटाइटल के साथ आती थी जिसे खिचड़ी के पाँच यारों का साथी ही समझिए, बचपन वाला बुद्धू बक्सा सचमें प्यारा था.. यादों की सम्पूर्ण थाती अपने में समेटता अब तो बस शो पीस की तरह लटका रहता है, घर का सबसे महंगा शो पीस बनकर...

तुम्हारी मैं

 इस पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रिय

प्रिय तुम                                                        

तुम्हें लिख रही हूँ

पर देखा जाए तो वजह कायदे से कुछ भी नहीं... 

तुमसे बात तक किए  एक अरसा गुज़र चुका है, और अब हूक की जगह सुकून ने ले ली है...

कुछ भी पाने की आरज़ू ख़त्म है हाँ पर फिर भी गले लगना चाहती हूँ कस के, तुम्हें देखना चाहती हूं जी भर के..हाँ बस इतना ही...

जानते हो मेरे पास आकाश के तारों जितने सवाल होते हैं पर तुम्हारी आवाज़ सुनते ही वो सारे सवाल खो जाते हैं कहीं... तुम डांट रहे होते हो और मैं तुम्हारी आवाज़ को घूंट घूंट खुद में जाता महसूस कर रही होती हूँ, अजीब हालात हैं शायद ज़रा बचकाना भी पर  इश्क़ बच्चा बना देता है और बेवकूफियां आपके सिर चढ़ के बोलती हैं, पूरी दुनिया के लिए मैं समझदार हूँ और तुम्हारे आगे जाने कैसे बिल्कुल बेवकूफ हो जाती हूँ

जानते हो तुम्हारी बेरूखी से बेज़ार हो कर कई बार कोशिश की कि तुम्हारे ख्याल को अपने वजूद से उतार कर परे रख दूं कई बार चाहा  कि तुम्हारी जगह किसी ऐसे को दे दूं जो आसानी से हासिल हो जाए पर हर बार हर किसी में तुम्हें ही तलाशा... तुम्हें ढूंढती रही पर तुम तो एक ही हो ...ना तुम मिले ना तुम्हारी जगह किसी और को दे पाई.. 

तुम पर आकर अटक सी गई हूं मैं ना आगे जा पाती हूँ ना पीछे ही लौट पाती हूँ...

मैं कभी सवाल नहीं करती, किसी से भी नहीं, अच्छे बुरे किसी हालात में नहीं पर तुम्हारे लिए ही मेरे सारे सवाल हैं और तुम्हारा हर जवाब मुझे तुम्हारे कुछ और करीब ले आता है...

जब कहते हो कि फीलिंग्स म्युचुअल हैं तो दिल करता सारी रवायतें उठा दूं और सब तोड़ के छोड़ के दफ़ा कर के बस तुम्हारे पास आ जाऊं फिर रोकती हूँ खुद को , ज़िम्मेदारी हैं तुम्हारे हिस्से जानती हूँ, जानती हूँ कि तुम्हारी उलझनों का आकार मेरी सारी बेचैनियों से कहीं बड़ा है मुझे अब कोई उम्मीद भी नहीं कि इस ज़िन्दगी में कभी तुम्हारे नाम को खुद से जोड़ सकूंगी पर इतना ज़रूर जानती हूँ कि मेरे अंदर जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ तुमसे जुड़ा है तुम ना भी हो तो तुम्हारे ख्यालों के साथ ज़िन्दगी जी सकती हूं... 

जब कहते हो के हमारे बीच कुछ भी नहीं तो मैं सबसे पहले खुद की आँखें देखती हूँ वहाँ जब तक तुम नज़र आओगे मैं जानती हूँ तुम हो क्योंकि जब तुम नहीं थे मैं महसूस कर पाई थी...

 जाने क्या है हर बार हर कसौटी दिल अकेले पार कर लेता है इसे किसी नियम कायदे की ज़रूरत नहीं निरा बेवकूफ जो ठहरा तो जब तक यह ना कहे कि कुछ नहीं बचा, नहीं मानूंगी...तुम्हारे कहने से भी नहीं

अक्सर लोग सवाल करते हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई है, मैं साफ कहती हूँ नहीं है क्योंकि जो हालात हैं तुम मेरी ज़िन्दगी में नहीं हो, हो भी नहीं सकते पर तुम मुझमें हो मेरी आँखों में, यादों में, धड़कनों में, हर ख़्याल में पुरवजूद पर तारी... 

मेरा इश्क़ समझते हो तुम, एक तुम्हीं हो जो ये जानते हो कि पाने खोने से इतर मैं सिर्फ प्यार में हूँ अक्सर लोग कहते हैं कोई भविष्य नहीं है मेरे इस जुड़ाव का और मैं फिर भी जानती हूँ मुझे वहीं होना है जहाँ मैं हूँ क्योंकि प्रेम है कोई म्युचुअल फंड थोड़े है कि रिटर्न्स की फिक्र करूँ

किसी के कुछ भी समझाने का फायदा अब नहीं होता, मैं इश्क में हूँ

 हाँ चलो आज सरेआम  मान भी लिया कि हाँ मैं हूँ प्रेम में और इतनी पूरी हूँ कि किसी और की गुंजाइश तक नहीं 


गणित चाहे ज़िन्दगी के स्कूल का हो या स्कूल वाली ज़िन्दगी का मैंने हमेशा कठिन चुना, जो सबको आसान लगता मुझे मुश्किल लगता और जो सबको मुश्किल लगता मैं वही सवाल ठीक ठीक सुलझा कर आती, इस तरह अपनी ज़िन्दगी में कभी कुछ भी आसान नहीं चुनने वाली रही हूँ मैं, और शायद तभी तो तुम हो मेरे लिए ...


भौगोलिक समीकरणों में चाहे तुम कहीं भी हो पर मुझमें सिर्फ तुम हो थे रहोगे ताउम्र, और साथ ही रहेंगी मेरी बेवकूफियां... ऐसी ही हूँ मैं और रहूँगी हमेशा सिर्फ़ तुम्हारी होकर...         

 तुम्हारी और सिर्फ़ तुम्हारी-मैं

इंसान हैं हम सामान नहीं

 तुमने वन नाइट स्टैंड पर बात की मतलब तुम अवेलेबल हो, रात 11 बजे के बाद ऑनलाइन हो तो अवेलेबल हो, किसी को फोन नंबर दे दिया बात कर ली तो अवेलेबल हो , खुले आम शराब की बात कर रही हो तो अवेलेबल हो, हँस के बतिया ले रही हो तो अवेलेबल हो, आगे बढ़ के गले लग ले रही हो तो अवेलेबल हो, तुम्हारी अधिकतर पोस्ट स्त्रीवादी है, माय बॉडी माय च्वॉइस कि हिमायती भी हो तो मतलब एक दम्म अवेलेबल हो, सिंगल मदर हो तो अवेलेबल हो, शादी में दिक्कत है तो अवेलेबल हो, प्रेम प्यार इश्क़ मोहब्बत पर भी लिख लेती हो तो अवेलेबल हो, तुमसे फलाने ने बदतमीज़ी की मतलब तुम अवेलेबल हो, अवसाद का शिकार हो तो कंधों की ज़रूरत होगी यानि अवेलेबल हो, मुझसे तो आज तक ऐसी कोई ओछी बात किसी ने ना की मतलब तुम ही अवेलेबल हो, स्क्रीनशॉट लगा रही हो तुम्हें ही क्यों आए मैसेज यानि अवेलेबल हो फेसबुक पर एक साथ इतनी पोस्ट करती हो तुम्हारी लाइफ नहीं कोई लगता है वाओ यानि अवेलेबल हो , अनजान लोगों से दोस्ती कर लेती हो यानि अवेलेबल हो, इतना टिपटॉप सज संवर के रहती हो तो अवेलेबल हो,लिव इन मे रह रही हो तो अवेलेबल हो और भी ब्ला ब्ला ब्ला


मतलब जानती हो कि ये सब करोगी तो अवेलेबल ही मानी  जाओगी फिर भी ये सब करती हो तो सौ प्रतिशत isi मार्क के साथ यूनिसेफ यूनेस्को से प्रमाणित तौर पर अवेलेबल हो, अवेलेबल हो, अवेलेबल हो....hence proved अवेलेबल हो...


जानती हो ये सब तुम, तो करती क्यों हो ये सब अवेलेबल हो इसीलिए ना, लोगों को तुमसे ही तो हिम्मत मिलती है लड़कों /आदमियों को तुम्ही ने तो जताया था कि तुम अवेलेबल हो...


ये वो जुमले हैं जो मैंने, आपने, हम सब औरतों ने कभी ना कभी ज़रूर सुना होगा (हमें तो कभी किसी ने कुछ नहीं कहा मतलब जिन्हें कहा वही अवेलेबल थी बताने मत आना प्लीज़)


तो बैक टू द पॉइंट पहली बात ये कि औरत हैं हम पार्लेजी का बिस्कुट नहीं जो अवेलेबल हों

 हम अगर किसी भी मुद्दे पर बात भर कर लें तो हम अवेलेबल मान लिए जाएंगे आपके ये मान लेने पर आप पर सवाल भी नहीं उठेंगे...क्यों? सिर्फ़ इसलिए कि आप आदमी हैं?? रात के ग्यारह बजे हम ऑनलाइन हैं ये देखने आप भी तो जग ही रहे तो इस आधार पर हमारा कैरेक्टर ऐसेसनेशन ही क्यों आपका क्यों नहीं? रात पी ली थी तो बहक गया था ये कहके आप पाक पवित्र हो लिए और जिसके इनबॉक्स में आप घुसे थे वो छिनाल,क्यों? 

शादी नहीं ठीक किसी की तो आपको बाबा बनने क्यों जाना है? क्यों तीसरा बनना है? क्यों जानना है कि औरत और उसके पति के बीच संबंध कब बने थे? क्या साबित होगा इससे, कि वो अवेलेबल है आपकी कुत्सित मानसिकता और ज़लील इरादे पूरे करने के लिए ?

इन सभी सवालों को किसी भी औरत से पूछने से पहले अपने गिरेबान में झांकिए कि आप कितने दूध के धुले हैं, औरतें हमेशा से इज़ी टारगेट हैं, इमोशनल हैं (हाँ एक्सेप्शन से इनकार नहीं है मुझे पर उनका प्रतिशत कम ही है) इंसान नहीं सही औरत तो समझिए उसे, आपके समकक्ष ही है वो भी, हाड़ माँस की बनी एक इंसान जिसमें बुराइयां उतनी ही स्वाभाविक हैं जितनी एक पुरूष में, प्रेम में वो भी पिघलती है, समर्पित होती है, कोई नापसंद कर गई हो तो उसका मतलब आपका मेल ईगो हर्ट करना नहीं चुनने के अधिकार का इस्तेमाल करना होता है, बेबाकी से वो किसी भी चीज़ के बारे में अगर बात कर ले रही तो मतलब वो इन टैबूज़ से ऊपर उठ चुकी है, उसके जीवन में सबकुछ सही नहीं है तो मतलब वो लड़ना संघर्ष करना सीख रही है, कहते हैं ना आप कुछ भी करें आपकी गलतियां और रास्ते में आई चुनौतियां ये बताती है कि आप काम कर रहे, तो ये मानिए कि वो अपने आसपास खींचे गए गोले से या तो निकलना चाह रही या उस गोले को बड़ा कर रही सांस लेने लायक...

आप पुरूष हैं और इस पितृसत्तात्मक दुनिया में ज़रा प्रिविलेज्ड भी हैं तो दोस्त बनिए, हाथ थामें या चाहें तो पीछे हैं ये आश्वासन भर दें, ना तो मैं प्रेम करने से मना कर रही ना सेक्स को टैबू बना रही बस इतना कह रही कि 

1.अवेलेबल का टैग देना बंद कीजिए, हम इंसान हैं,औरत हैं सामान नहीं।

2.पौलीगेमी या एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर भी चरित्र का मसला नहीं हैं भरोसे, कम्फर्ट, पारदर्शिता, संतुष्टि और खुशी आदि का मसला हैं।

3. सेक्स पर बात करने भर से न तो औरत सेक्स के लिए अवेलेबल है ना ही  कैरेक्टरलैस, ये चरित्र का पैमाना नहीं है, नहीं होना चाहिए।

4. अपनी मर्ज़ी से लिव इन में रहने वाली, अपना पार्टनर चुनने वाली या, जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाली औरतें ना तो रंडी हैं ना छिनाल और ना ही कोई सामान जिसे रखा जाए।


तो औरत को सामान की तरह अवेलेबल मानना बंद कीजिए उसे देवी समझने की कोई ज़रूरत नहीं है बस इंसान समझिए, उतना काफ़ी है, उसकी पूजा करने की कोई ज़रूरत नहीं उसका सम्मान करने की ज़रूरत है, अपने से ऊपर नहीं बराबर मानना है उसे... 


बस इतना ही...



हम दोगले लोग

 काली हो, मोटी हो, पतली हो झाड़ू की सींक जैसी हो हथिनी हो, ड्रम हो, रंग दबा है, चेहरे पर दाग हैं, नाक फूली हुई है, चिपटी है, आँखें छोटी है, नेपालियों जैसी है, चिंकियो जैसी है, बाल झड़े हुए हैं, सफ़ेद हैं, झाड़ू हैं, इतनी काली है कि जैसे मनहूसियत..और भी कितना कुछ...

दिल को छलनी करती फब्तियां और उसके बाद ये ऐक्सक्यूज़

-अरे बुरा मान गए क्या मज़ाक था यार इट्स ओक्के ना...

-तुम क्या किसी को कहोगी भैंगी जैसी तो शक्ल है तुम्हारी..

-उसको तो राह चलते कोई छेड़ेगा भी ना (ये सबसे भयानक टिप्पणी सुनी थी मैंने एक महिला के लिए और शर्मिंदा हूँ यह कहते हुए कि कहने वाले लोग प्रबुद्ध वर्ग का हिस्सा थे, पढ़े लिखे थे)

कहाँ कह पाए हम कि बॉस नो, ईट्स नॉट ओक्के, ईट्स नॉट ओक्के ऐट ऑल...

कितना मामूली है ना ये सब , कितना आम, किसने नहीं कहा होगा? शायद हम सब ने कहा है, कभी ना कभी, कहीं ना कहीं...कभी ठहाकों में तो कभी शायद गुस्से में, ईर्ष्या से या शायद ऐसी ही किसी भावना से,  तो क्या हम सब अपराधी हैं?

 हाँ, यही कड़वा सच है...हम अपराधी हैं...


दिन भर में ना जाने कितनी ही बार हम ऐसी मौखिक हिंसा  करते हैं। गाहे ब गाहे एक इंसान को उसकी शारिरिक संरचना के आधार पर तौलते हैं हम...

एक इंसान के तमाम गुण दोष किनारे रख कर उसे जज करने का एक मात्र मापदंड रह जाता है उसका फिज़िकल अपीयरेन्स... वो फिज़िकल अपीयरेंस जिसके अच्छे बुरे होने पर किसी का भी अधिकार ही नहीं है, उसे लेकर किसी को कोसना, जज करना....क्या ये न्याय है?... सोचिए!


 औसत लोग इसका शिकार भी होते हैं... हाँ होते हैं और खूब होते हैं, चिंता मत कीजिए मैं कोई दुःख भरी दास्तान सुना के आपको बोर नहीं करूंगी क्योंकि मैं जानती हूँ एक मेरे कहने से क्या ही बदल जाएगा? 


आप नहीं हुए शिकार, तो आपको बधाई आप प्रिविलेज्ड हैं...


पर कभी सोचा है कि आपका यूं ही किया गया एक मज़ाक किस तरह किसी की इंडीविजुअलिटी की धज्जियां उड़ा देता है, किस तरह किसी के आत्मविश्वास को तार तार करता है, किस तरह एक इंसान से जीने की इच्छा मात्र छीन लेता है...

पूरी ज़िन्दगी भेदभाव के बोझ के नीचे दबकर जीने वाली आधी जनसंख्या या तो फेयर एंड लवली के पीछे दौड़ती दिखती है या ग्रीन टी के पीछे जीभ लपलपाते हुए। 

खूबसूरत होने के इतने तय पैमाने हैं, इतने सारे पैरामीटर्स कि बंदा पैराशूट ले कर हवाई जहाज़ से तो फिर भी कूद ले पर इन पैरामीटर्स के अनुसार सो कॉल्ड खूबसूरत हो सके, असंभव है...

ब्यूटी होल्ड्स इन द आईज़ ऑफ बीहोल्डर ये सब हमने पढ़ा और फिर भूल गए..


और इन सबके बीच सबसे बड़ी विडंबना तब होती है जब किसी भेदभाव के खिलाफ वो लोग खड़े दिखते हैं जो पूरी ज़िन्दगी इस मौखिक हिंसा का हिस्सा रहे हैं..


फिर एक घटना घटती है,  किसी बड़े से देश के छोटे से कोने में और सबकी सोई इंसानियत जाग जाती है...


अजीब हिप्पोक्रेट्स हैं हम…..आला दर्जे के..

वो पगली लड़की

 और धीरे धीरे तुमने अपनी ही बनाई तस्वीर अपने ही हाथों से मिटा दी, 

डबडबाई आँखों से वो तुम्हें ताकती रही और तुम बर्बरता से हर रंग मिटाते गए, खुरचते रहे...

 जानते हो उसकी बड़ी बड़ी पनीली आँखें अब भी अपनी गलतियों का हिसाब माँगती हैं...उसकी घुटी हुई चीख का दम घोंटता शोर तुम सुन सकते हो न...

पर क्या ग़लती सच में उसकी थी? या तुम्हीं ने रचा था चक्रव्यूह जिसमें वह छटपटा के रह गई?


सच कहना, क्या वाकई तुममें है इतनी कूवत कि तुम उसके किसी सवाल का सामना कर सको, वो हौसला कहाँ से लाओगे कि उसकी झुकी नज़रों के आगे तन के खड़े हो सको...ज़ुबान लड़खड़ा नहीं जाएगी तुम्हारी ... 

शायद  इसलिए तुम चुप हो जाते हो,है न...


अफ़सोस सिर्फ़ इतना है कि तुम्हारे साथ तुम्हारी ही चुप्पियों का लबादा उस पगली लड़की ने भी ओढ़ लिया है...वो किसी से कुछ नहीं कहती बस घुटती रहती है, घुलती रहती है...


उसकी चुप्पी तुम्हें भी पिघला देगी, तार तार कर बिखेर देगी..सब जानते हो तुम...

हाँ अब तुम जानते हो चुप्पियों की चुभन सबसे ज़्यादा मारक होती है...सबसे ज़्यादा...


और मैं, मैं बनूँगी इन सबकी गवाह , आप भी....हम सब बनेंगे...महज़ मूकदर्शक... बेहद कमज़ोर और टूटे फूटे लोग हैं हम, है न???

गालियाँ और हम