Sunday, 12 April 2020

लघु कथा

#एक_कहानी_ऐसी_भी

धानी ने बेहद कस के उसका हाथ पकड़ रखा था जैसे अगर किसी ने वो हाथ छुड़ा दिया तो साँसे ही घुट जाएँगी....
रेस्त्रां के उस आखिरी कोने वाली टू सीटर पर बैठी वो अपने प्रेमी को एकटक निहार ही रही थी....
अचानक... जाने क्यों, वो बोला," धानी मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ ....कभी कभी जता देना चाहता हूँ कि तुम्हारे लिए मेरे प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ किस सीमा पर है..."
धानी उसकी बातें सुनकर मुस्कुरा पाती उससे पहले ही वो बोला "धानी लाओ ना तुम्हें सिंदूर लगा दूँ..."
धानी ने अपनी बड़ी बड़ी आँखे और बड़ी कर उसे देखा....
प्रेमी की साधिकार कही गई ये बात उसपर कुछ अलग ही असर कर गई थी...

प्रेमी को अवाक सा देखता छोड़ धानी तेज़ी से रेस्त्रां के बाहर आ गई... अंदर बढ़ती घुटन से निकलने का और कोई ज़रिया था भी नहीं... अब एक मिनट और रुकना उसके लिए मुमकिन नहीं था...जाते जाते वो पलटी, पनीली आँखों से उसने अपने प्रेमी को देखा और हाथ हिला कर ऑटो रोक लिया...
-"भईया गोल मंडी ले लो" ऑटो वाले को बोलकर धानी जल्दी से ऑटो में बैठ गई....
तेज़ी से दौड़ लगाते वक्त और रास्तों को धानी भागती इमारतों के साथ भरसक पीछे धकेल रही थी...
प्रेमी के सिन्दूर वाले निवेदन पर धानी अब ये सोचते हुए मुस्कुरा रही थी कि हद होते हैं ये सारे आदमी भी सब के सब सिन्दूर चूड़ी बिंदी पर ही क्यों अटक जाते हैं? आखिर औरत है या कि ज़मीन आ टुकड़ा जिसपर आधिकार की मुहर लगाकर इनका अहम संतुष्ट हो जाता है...
आदमी चाहे प्रेमी हो या पति अधिकार वाली रजिस्ट्री की चाह उसमें कभी नहीं मरती.....

धानी ने घड़ी देखी शाम के 6 बजने वाले थे "भईया ज़रा तेज़ चलाओ ना'' कहकर धानी ज़रा उतावली सी हो गई थी....
उसे खाना बनाना था आखिर पति और बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे थे....

अल्हड़ कोशिश...


ताकि साँस ली जा सके/कविता

किसी संभावना का
किसी प्रिय संबंध का
टूटना दरकना
कहाँ होता है
अनायास
ये तो प्रक्रिया है
सतत चलती हुई
और एक दिन
सब बिखर जाता है
मेरी तरह तुम्हारी तरह
टुकड़े टुकड़े हो जाती है ज़िन्दगी
शिकायत के लिए
या कि प्रार्थना के लिए
तब नहीं जुड़ पाते हाथ
कि सब कुछ
बिखर जाने के ठीक पहले
समेट लिया जाना चाहिए
बचा ले जाने की
वो आखिरी कोशिश
कर लेनी चाहिए
कि जिसे संजोया था
सदियों तक
जान लेना चाहिए
कि संजोया नहीं था
ढोया था,यही सच है
सुनो!टूटे टुकड़े समेट कर
एक पोटली में बाँध देना चाहिए
उसी पोटली में धर देना चाहिए
यादों के खोटे सिक्के
कर आना चाहिए प्रवाहित
बहती धारा में
और हो जाना चाहिए आज़ाद
अपनी ही बेड़ियों से...
कि ताकि साँस ली जा सके...

यूं ही बैठे ठाले...मेरा घर...

मेरे लिए घर का मतलब है ज़रा सा बेढंगापन....
जो जहाँ है, वो वहीं रहे तो ये मुझे जीवन का ठहर जाना लगता है, बिस्तर की सिलवटों से मुझे बिल्कुल उलझन नहीं होती बल्कि 24 घंटे सजे संवरे घर से कोफ्त होती है,अजीब सा लगता है।
चुक्कू, यानि बेटी के बिखरे खिलौने, मेरी औंधी पड़ी किताब, कॉफी का मग और कोने में पड़ा मनी प्लांट मुझे सुकून देता है।
मेरे लिए सफ़ाई सिर्फ हाइजीन का ध्यान रखना है ना कि कोई दिमागी फ़ितूर कि हर वक़्त जिसमें उलझा रहा जाए, ठंड का मौसम हो तो बिना नहाए खाए लगातार पढ़ सकती हूँ किताबें इश्क़ हैं मेरा, फ़िल्म देख सकती हूँ-मेरे नज़दीक ज़िन्दगी का आईना हैं ये, किसी बात का अंकुश बर्दाश्त नहीं होता मुझसे-घुटन होती है, झुंझला जाती हूँ, तो बेतरतीबी मेरी आदत नहीं मेरा स्वभाव है और मेरा घर मेरी बेतरतीबियों में ही पुरसुकून रहता है...
यूं भी घर वो जगह है जहाँ आप सुकून से अपने पाँव फैला सकें...जैसे हों वैसे रह सकें, बिल्कुल वैसे जैसे आपका मिजाज़ हो बेलागलपेट, बेरोकटोक... जहाँ आप पर किसी औपचारिकता का बोझ ना हो, जहाँ मुश्किलें मिनटों में सुलझें या नहीं पर उनसे लड़ने की हिम्मत ज़रूर मिल जाए, घर का मतलब महज़ चाहरदीवारी और छत नहीं है बल्कि वो 'मी स्पेस' है जहाँ आप एक मुकम्मल शख्स बनने के प्रॉसेस में कुछ वक़्त का ठौर पा सकें...
यूं कह लीजिए कि ज़िन्दगी के खेल का टाइम प्लीज़ है घर..और ये घर किसी अपने की गोद या आपके वजूद को समेट लेती बाहें भी हो सकता है...
यूं तो बेतरतीब होने को दुनिया गुनाह मानती होगी पर मुझे लगता है कि ये बेतरतीबी ही स्वाभाविक है। दुनिया की हर शय जो ज़रा बेतरतीब है, raw है अधपकी सी है, अल्हड़ है, खूबसूरत है।
 मुलम्मे चढ़ी नफ़ासत पसंद ज़िंदगी ज़रा नकली सी हो जाती है, नहीं?? कम से कम कोई एक ऐसा कोना तो हो कि जहाँ आप तमाम नकली चेहरे मुलम्मे सबकुछ उतार कर रख ही सकते हों, हैं ना??? घर बस वही जगह है...
 हाँ मैंने देखा है लोगों को करीने से सजा बुत बनकर अपना आप खोते हुए...बस इतना कि घर अपनाइयत का मोहताज़ है, चाक-चौबंद सफाई सिस्टम का नहीं वरना घर और पाँच सितारा होटल में और फर्क ही क्या है ...
अपनी बात करूं तो जाने क्यों बिखरी सी उलझनों में मैं खुद को बेहतर तलाश कर पाती हूँ...और बस ऐसा ही बिखरा सा है मेरा घर...जहाँ रोटी की सौंधी ख़ुशबू नहीं सपनों की मद्धिम आँच रहती है....
हाँ मेरा घर....ज़रा बेतरतीब पर अपना सा....